आख़िरी पन्ना
मेरे डायरी के आख़िरी पन्नों में,
उन गुलाबी पंखुड़ियों को सहेज रखा है,
तुम्हारी हर एक मीठी याद को,
मैंने दिल के किसी कोने में संभाल रखा है।
तुम्हारे दिए हर उस तोहफे को,
आज भी सीने में ताज़ा रखा है,
वो वादे जो तुमने कभी किए थे,
उन्हें आख़िरी पन्ने तक ज़िंदा रखा है।
जैसे राधा ने कृष्ण की राह देखी,
मैंने भी इंतज़ार में सदियाँ काटी हैं,
भले मजबूरी मेरी अगले पन्नों सी धुंधली हो,
पर मेरी रूह आज भी तुम्हीं में बांटी है।
मैं अक्सर सोचती हूँ…
जो ये आख़िरी पन्ना न होता तो क्या होता?
शायद मेरे सब्र का बांध कहीं खो गया होता।
पर जब तक ये पन्ना है, ये साँस है,
तेरा इंतज़ार ही मेरी सबसे बड़ी आस है।
— तुम्हारी प्रेयसी
ज्योती वर्णवाल
मेरी स्वरचित रचना
नवादा (बिहार)