विषय -मोड़ ऐसा भी ना आए कोई
विद्या-कविता
शीर्षक: मोड़ ऐसा भी न आए कोई
मोड़ ऐसा भी न आए कोई
ज़िंदगी की कठिन राहों में चलता हुआ,
इक ऐसा मंज़र भी कभी आता है।
जब इंसान बेबस होकर ख़ुद से ही,
ये करुण बात दोहराता है।
की सब कुछ पा लेने की इस दुनिया में,
मोड़ ऐसा भी कभी न आए कोई।
अचानक घटती है कोई ऐसी घटना,
कि भीतर तक टूट जाए कोई।
वो पल जो सब कुछ छीन लेता है,
जब घर छोड़ निकलना पड़ता है।
अपनों के दिए गहरे ज़ख्मों को,
चुपचाप हृदय में भरना पड़ता है।
बसा-बसाया घर उजड़ जाता है,
जब अपने ही बैरी हो जाते हैं।
विश्वास की कोमल जड़ को काट,
जो नफ़रत के बीज बो जाते हैं।
जैसे मासूम पंछी का कोई नीड़,
इक ढेला मारकर गिरा देता हो।
तिनका-तिनका जोड़ बना घोंसला,
पल भर में उजाड़ देता हो।
ठीक वैसे ही हर एक कुनबे में,
इक शिकारी अपनों के भेष में है।
जो खुशियाँ सारी निगल जाता है,
वो बैठा हुआ इसी परिवेश में है।
ईश्वर से बस यही एक प्रार्थना है,
कि छल की ऐसी आग न जलाए कोई।
किसी की भी हँसती-खेलती ज़िंदगी में,
मोड़ ऐसा भी कभी न आए कोई।
ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)
मेरी स्वरचित रचना ✍️