तेरी बाहों में जो ठहर जाए – ज्योती वर्णवाल 

शीर्षक: तेरी बाहों में जो ठहर जाए

 

सच कहती हूँ…

जब भी थमती हूँ तुम्हारी इन बाहों में,

मुझे फिर से वो ‘रंजीत ‘ याद आता है।

वो पहली नज़र, जब हम दोनों मिले थे,

और मन ही मन तुम्हें हमसफर चुना था।

पता नहीं, उस पल तुम्हारी मर्ज़ी क्या थी,

पर मेरा मन तो तुम्हारी बाहों में ठहर जाने को था।

कितने हसीन थे वो पल…

जब तुमने हौले से कहा था— “तुम मुझे पसंद हो!”

और फिर अधिकार से थाम कर हाथ कहा—

“चलो न! अभी हमारे साथ, हमारे घर…”

मैं शरमाई थी, और सिमट कर कहा था—

“ऐसे नहीं! डोली-बारात लेकर आना,

तभी हँसी-खुशी चलूँगी तुम्हारे साथ।”

उस पल को मैंने हर दिन, हर पल जिया है,

जैसे हर साल बसंत की नई पाती आती है।

जन्मों-जन्म साथ रहने की जो कसमें खाई थीं,

वो आज भी मेरे सासों में महकती हैं।

अब तो बस एक ही हसरत है मन में,

कि ये जीवन तुम्हारी छांव में ही बीते।

और जब आए विदा की वो अंतिम घड़ी,

तो मेरी आखिरी सांस भी तुम्हारे चरणों में ही हो।

सिर्फ तुम्हारे चरणों में ही हो…

 

ज्योती वर्णवाल

नवादा (बिहार)