,,,,,,,,,,,,,*ग़ज़ल* ,,,,,,,,
बचाले तू अज़ाब ए कब्र से हम सबको ऐ मौला, साहिल प्रतापगढ़ी,,,,,
अनुराग लक्ष्य, 15 दिसंबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
मुंबई की साहित्यिक और अदबी महफिलों में अपनी बेहतरीन शायरी से सबके मंत्रमुग्ध कर देने वाले शायर साहिल प्रतापगढ़ी आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अक्सर वोह कहीं न कहीं दिख जाते हैं। यही वजह है कि साहिल प्रतापगढ़ी अपनी शानदार प्रस्तुति के ज़रिए मुंबई में काफी सराहे जा रहे हैं। प्रस्तुत है आज उन्हीं की एक ग़ज़ल ।
*१* – कहीं पे तोप बंदूकें कहीं खंजर निकलते हैं,
दुआओं के सहारे फिर भी हम बचकर निकलते हैं ।
*२* – खड़े रहते हैं सर अपना झुकाये साहिबे मसनद,
कहीं भी उनके रस्ते से जब कलंदर निकलते हैं ।
*३* – चला जो अबरहा काबे को ढाने के लिए देखो,
लिये कंकड़ अबाबीलों के फिर लश्कर निकलते हैं ।
*४* – शुजाअत हौसला हिम्मत रवाॅं है खून में उनके,
फतह खैबर हुआ है जब अली हैदर निकलते हैं ।
*५* – बचा ले तू अज़ाबे कब्र से हम सब को या मौला,
सुना है सांप बिच्छू कब्र के अंदर निकलते हैं ।
*६* – नहीं है जंग में सानी जवाने हिंद का कोई,
लिये जब जान अपनी वो हथेली पर निकलते हैं ।
*७* – अभी हारे तो सब कुछ खाक में मिल जायेगा .
चलो इस बार हम सब साथ मिलजुलकर निकलते हैं ।
पेशकश, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी, ब्यूरो प्रभारी अनुराग लक्ष्य मुंबई ।