नफरत नहीं प्रेम कर – मधु गुप्ता

नफरत नहीं प्रेम कर

विधा-कविता…

नफरत घृणा फैलाती है,

प्रेम सुखद जीवन का एहसास।

मन को सरावोर कर देता है,

जब प्रेम छलकाता स्नेह आपार।

 

प्रेम बांध ले बख़ूबी रिश्तों को,

जैसे धागे में मोती हो एक साथ।

नफरत करे रिश्तों को पल में बदरंगा,

झीना कर दे कपड़ा प्रेम का हर बार।

 

प्रेम तो है खुशियों का खजाना,

बेगानों को बना ले पल में अपना।

नफरत उगले जहर का प्याला,

खड़ा कर दे झट रिश्तों में झगड़ा।

 

नफरत नहीं प्रेम बरसाओ सब पर,

लाचार मजबूर को बना लो अपना।

नफरत को मिट्टी में दफ़ना कर,

लगा दो उस पर प्रेम का तड़का।

मधु गुप्ता “अपराजिता”

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