उसका वादा था मिलेंगे हम किसी इतवार को।

इस तरह मज़बूत कर लो जिस्म की दीवार को,
तोड़ दे जो वक़्त के फिरौन की तलवार को।

अब वतन का एक तबक़ा पूछता है ये सवाल,
और कितनी माब लिंचिंग चाहिए सरकार को।

बस उसी इतवार की ख़ातिर हूँ ज़िंदा आज तक,
उसका वादा था मिलेंगे हम किसी इतवार को।

रस्म बनकर रह गया है अब हमारे बीच ये,
अब कहाँ दिल से मानता है कोई त्योहार को।

बस फुंका पानी,दुआ,ताबीज़ ही काफ़ी नहीं,
कुछ दवा के नाम पर भी दीजिए बीमार को।

दस्तरस में आप के कुछ भी नहीं इसके सिवा,
सर पकड़ कर बैठिए और कोसिये सरकार को।

ज़िल्ले सूबहानी से रंजिश कर के बैठे हैं नदीम,
ये ख़बर जितनी हो जल्दी भेज दो अख़बार को।

नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥