अयोध्या में ‘सृष्टि सृजन’ महायज्ञ का शंखनाद पर्यावरण शुद्धि और विश्व कल्याण का संकल्प

 

महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या धाम। धर्मनगरी अयोध्या में सिद्ध पीठ राम धाम विद्या कुंड के दासानुदास महामंडलेश्वर महंत प्रेम शंकर दास और चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ के महल बड़ी जगह के महंत बिंदुगद्याचार्य देवेंद्र प्रसादाचार्य ने भव्य और महत्वपूर्ण ‘सृष्टि सृजन’ महायज्ञ की विधिवत शुरुआत कर दी है। इस महाअनुष्ठान का उद्देश्य सृष्टि के सृजन के मूल को समझना और वातावरण का शुद्धिकरण करना है, जिसका शंखनाद होते ही पूरे क्षेत्र में भक्ति और अध्यात्म का वातावरण छा गया है। यज्ञ भगवान विष्णु का स्वरूप और सृष्टि का आधार यज्ञ की महत्ता बताते हुए दासानुदास महामंडलेश्वर महंत प्रेम शंकर दास महाराज ने कहा, “माना जाता है कि यज्ञ ही सृष्टि का सृजन करता है। यह स्वयं भगवान विष्णु का स्वरूप है और यहाँ तक कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का प्रकट भी यज्ञ से ही हुआ था।”
उन्होंने पर्यावरण शुद्धि पर जोर देते हुए आगे कहा, “यदि यज्ञ नहीं होती तो आज सृष्टि की स्थिति बहुत बिगड़ गई होती। यज्ञ प्रदूषित वातावरण को शुद्ध करता है और इससे निकलने वाला धुआँ बादल बनकर वर्षा कराता है, जिससे हमारी कृषि होती है।” यह कथन न केवल आध्यात्मिक महत्व को दर्शाता है, बल्कि यज्ञ को पर्यावरणीय संतुलन का एक प्राचीन साधन भी सिद्ध करता है। श्रद्धा और समर्पण का संगम इस पावन यज्ञ में अनेक श्रद्धालु यजमान बनकर परमात्मा के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित कर रहे हैं। इस सामूहिक समर्पण में वाराणसी से परमेश्वर मिश्रा जी, औरंगाबाद से श्री विश्वनाथ तिवारी, विवेक सिंह, और बसंतपुर से आनंदी सिंह जैसे गणमान्य लोग शामिल हैं।
आयोजकों ने इस अवसर को सभी का सौभाग्य बताते हुए कहा, “यह महायज्ञ भगवान की प्रकट तक चला है। यहाँ कुछ भी हो रहा है, ऐसा केवल भगवान की कृपा से संभव है। हमारा यह समर्पण भगवान के चरणों में काम करेगा। शुभ आरंभ सफलता की कुंजी आयोजन की शुरुआत स्वयं महंत बिंदुगद्याचार्य देवेंद्र प्रसादाचार्य द्वारा की गई है। महंत प्रेम शंकर दास महाराज कहते हैं , “जिसकी शुरुआत अच्छी होती है, उसका यज्ञ अच्छा होता है।” यह शुभ आरंभ भक्तों के मन में यज्ञ की सफलता, विश्व कल्याण की भावना, और पर्यावरणीय शुद्धिकरण के संकल्प को और दृढ़ कर रहा है। यह यज्ञ केवल आध्यात्मिक उन्नति का नहीं, बल्कि सामूहिक सहयोग और प्राचीन भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण का भी प्रतीक है।