चाय हिन्दू नहीं होती न मुसलमान, आओ सबके लिए खुली है यह दुकान, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,,
अनुराग लक्ष्य, 13 नवंबर
मुम्बई संवाददाता ।
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी ।
इस दौर ए इंकलाब में आओ क़लम के साथ,
दुनिया के हर इक गोशे में छाओ क़लम के साथ ।
हो सामने सत्ता कोई या जुर्म का पहाड़,
हर एक को आईना दिखाओ क़लम के साथ ।।
पत्रकारिता के सम्मान में उपरोक्त पंक्तियाँ सलीम बस्तवी अज़ीज़ी ने जब जब किसी कवि सम्मेलन या मुशायरे में पढ़ी हैं। सामयीन और श्रोताओं ने भरपूर तालियों से उनका स्वागत किया है ।
वैसे तो पिछले 3 दशक से अधिक समय से सलीम बस्तवी अज़ीज़ी के बहुत सारे ऐसे कलाम हैं जो अक्सर उनसे फरमाइश कर दी जाती है। आज कुछ ऐसे ही चुनिंदा कलाम से आप रूबरू होने जा रहे हैं।
कभी ज़माने में ऐसा भी कोई यार मिले,
वफ़ा के नाम पे हर रोज़ उससे प्यार मिले ।
ग़रीब मैं सही मेरा शहर न ग़रीब रहे,
हमारे हाथों को कोई ऐसा कारोबार मिले ।।
इसी के साथ इस कलाम की मकबूलियत का अंदाज़ा आप खुद लगा सकते हैं कि,
मशकूर हूँ ममनून हूँ या रब्ब ए कायनात,
क़तरे को आज तूने समन्दर बना दिया ।
आगाज़ भी अंजाम भी उस शख़्स के ही नाम,
मलिक ने जिसे इल्म का गौहर बना दिया ।।
उनका यह चाय वाला गीत भी आज मुंबई में काफी सराहा जा रहा है,
वाह क्या चाय बनी, वाह वा क्या चाय बनी,
ज़िंदगी सोज़ बनी, ज़िंदगी साज़ बनी ।
यही मन्दिर पे बिके, यही मस्जिद पे बिके,
यही मुल्ला भी पिए यही पंडित भी पिए,
चाय हिन्दू नहीं होती न मुसलमान,
आओ सबके लिए खुली है यह दुकान ।।
गंगा जमुनी तहज़ीब पर सलीम बस्तवी अज़ीज़ी के पचासों ऐसे कलाम हैं जो हर कवि सम्मेलन या मुशायरे में लोग बहुत प्यार से सुनते हैं। मिसाल के तौर पर इस कलाम को भी देखा जा सकता है कि,
अगर है देखना दुनिया यह कितनी खूबसूरत है,
तो मोहब्बत कीजिए यह आपकी पहली ज़रूरत है ।
हुई है आरती मंदिर और मस्जिद में अज़ानें भी,
मोहब्बत करने का इस वक्त कितना शुभ मुहूरत है ।।