हमारे हाथ में कुछ आईने है

ग़ज़ल

सभी चेहरा छुपाते फिर रहे हैं
हमारे हाथ में कुछ आईने है

खिलाड़ी तुम पुराने ही सही पर
हमारे पैंतरे बिलकुल नए हैं

अभी लब पर लिए हैं प्यास लेकिन
कभी हम भी तो इक दरिया रहे हैं

हमारा दिल है वो तनहा मुसाफिर
कि जिसके साथ ग़म के काफिले हैं

निगाहे -तीर से तल्ख़े -ज़बाँ तक
निशाने हम पे सब साधे गए हैं

मुहब्बत की नज़र से इनको देखो
जो क़तरे हैं, कभी दरिया रहे हैं

कोई मुश्किल इन्हें कब तोड़ पाई
हमारे हौसले ज़िद्दी बड़े हैं

हमारी मौत का ज़िंदा हैं सामां
तुम्हारी आँख के जो मयक़दे है

कलेजे में हुई महसूस ठंडक
तुम्हारे लफ्ज़, या ओले पड़े हैं

“किरण” जो दिल के हैं काले वही बस
तरक्की देखकर तेरी जले हैं

©डॉ कविता “किरण”