मॉडर्न बनिए, पर वेस्टर्न नहीं

कल ही की बात है मेरी कॉलोनी के कुछ लोगोँ ने मेरी किताब यह देखकर नहीं पडी कि वो हिन्दी में हैं, और मुझे कई लोगोँ ने कहा कि किताब अंग्रेजी में लिखिए, हिन्दी की किताब कौन पड़ता है l

ये बात सुन्दर मैं हतप्रभ रह गयी माना कि किस भाषा की किताब पढ़ना है ये लोगोँ का निजी फैसला है लेकिन भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी है ना कि अंग्रेजी l और ये सब कुछ लोग सिर्फ मॉडर्न बनने और दिखावा करने के चक्कर में भी कर रहे हैं l

आज के दौर में मॉडर्न बनना यानी समय के साथ चलना, तकनीक, विज्ञान और नई सोच को अपनाना बहुत ज़रूरी हो गया है। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि मॉडर्न बनने की चाह में हम अकसर वेस्टर्न बनने की गलती कर बैठते हैं। 

मॉडर्न होना मतलब है कि हमारी सोच खुले, हम समानता, स्वतंत्रता और तरक्की की ओर बढ़ें, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपनी संस्कृति, भाषा और संस्कारों को छोड़ दें। वेस्टर्न बनने का मतलब सिर्फ़ पाश्चात्य पहनावा, बोलचाल और जीवनशैली की नकल करना नहीं होना चाहिए। 

हमें चाहिए कि हम मोबाइल और इंटरनेट का सही उपयोग करें, आधुनिक शिक्षा प्राप्त करें, स्त्री-पुरुष समानता को समझें, लेकिन साथ ही अपने माता-पिता का सम्मान करें, अपने त्योहारों, परंपराओं और मूल्यों को संजोए रखें। 

अंग्रेज़ी ज़रूर सीखें, लेकिन हिंदी और अपनी मातृभाषा को न भूलें। यही सच्चा संतुलन है — जहाँ हम मॉडर्न तो बनें, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े रहें। क्योंकि सच्ची प्रगति वही है, जो हमें आगे ले जाए, पर हमारी पहचान को मिटाए नहीं।

धन्यबाद 

नेहा वार्ष्णेय “धारा”

दुर्ग (छत्तीसगढ़)