अब आये हो अयादत को मेरी तुम, मगर अफ़सोस कि अब दूर हूँ मैं।

बिल्कुल एक नयी ग़ज़ल आपकी समाअतों के हवाले………….

सिकंदर हूं मगर मजबूर हूं मैं,
तुम्हारी नजरों में तैमूर हूँ मैं।

अब आये हो अयादत को मेरी तुम,
मगर अफ़सोस कि अब दूर हूँ मैं।

सनद मैं किस लिये माँगू किसी से,
मुझे मालूम है मशहूर हूँ मैं।

कहो मूसा से लहज़ा नर्म रख्खे,
अदब से गुफ़्तगू हो,तूर हूँ मैं।

ये किस ने मुझ पर चस्पा कर दिया है,
कि बद-इख़लाक़ हूँ,मगरूर हूँ मैं।

नज़र से धूप का चश्मा हटाओ,
दिखूँगा फिर तुम्हें मज़दूर हूँ मैं।

नदीम इस से ज़्यादा क्या कहूँ अब,
अदब का शहर गोरखपुर हूँ मैं।

नदीम अब्बासी ‘’नदीम’’
गोरखपुर।।