ए०डी०आर० भवन में आयोजित हुआ विधिक साक्षरता शिविर विधि छात्रों को प्रदान की गई विभिन्न जानकारियां

अम्बेडकरनगर।राम सुलीन सिंह, जनपद न्यायाधीश / अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, अम्बेडकरनगर के निर्देशानुसार आज दिनांक 15.05.2025 को ए०डी०आर० भवन, जनपद न्यायालय परिसर अम्बेठकरनगर में सी०बी० सिंह लॉ कालेज, सोनगांव, अकबरपुर, अम्बेडकरनगर के विधि छात्रों को राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, उ०प्र० राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा दी जाने वाली निःशुल्क विधिक सेवा/सहायता, लीगल एड डिफेन्स काउन्सिल, स्थायी लोक अदालत एवं अन्य विषयों पर विस्तृत जानकारी दी गई। इस अवसर पर भारतेन्दु प्रकाश गुप्ता, अपर जिला जज/सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, अम्बेडकरनगर, रमेश राम त्रिपाठी, चीफ एल०ए०डी०सी०एस०, शरद पाण्डेय, सहायक एल०ए०डी०सी०एस०, संदीप श्रीवास्तव, असिस्टेंट प्रोफेसर, अमित कुमार तिवारी, असिस्टेंट प्रोफेसर, श्रीमती किरन देवी, असिस्टेंट प्रोफेसर, सी०बी० सिंह लॉ कालेज, एवं लॉ कालेज के विधि छात्र-छात्रायें, जि०वि०से०प्रा० के कर्मचारीगण, पी०एल०वी० उपस्थित रहे। भारतेन्दु प्रकाश गुप्ता, अपर जनपद न्यायाधीश / सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, अम्बेडकरनगर द्वारा विधि छात्र-छात्राओं को वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र (ए०डी०आर०) के प्रावधान और लाभ के सम्बन्ध में बताया गया कि विवाद समाधान की पारंपरिक पद्धति न्यायिक प्रणाली में मुकदमेबाजी एक लंबी प्रक्रिया है, जिससे न्याय मिलने में विलम्ब होता है और यह प्रक्रिया महंगी भी होती है। विवाद के पक्षकारों को न्याय के लिए वर्षों का लम्बा इंतजार करना पड़ता है। इस प्रकार, गरीब और वंचित लोगों के लिए न्याय पाना बहुत मुश्किल हो गया है। मुकदमेबाजी की लंबी और महंगी प्रक्रिया ने आम जन परेशान हो जाते हैं। न्यायिक प्रणाली की इन कमजोरियों ने विवादों के निपटारे के लिए वैकल्पिक उपायों को जन्म दिया है। वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र (ए०डी०आर०) पारंपरिक अदालती कार्यवाही के बाहर बिना किसी सुनवाई के विवादों को सुलझाने और सौहार्दपूर्ण तरीके से विवादों को निपटाने की एक विधि है, जो सख्त प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं से मुक्त है, लागत प्रभावी है और त्वरित न्याय प्रदान करती है। यही कारण है कि विवाद करने वाले पक्षकारों द्वारा अपने विवादों के समाधान के लिए एडीआर तंत्र को प्राथमिकता दी जा रही है। ये प्रक्रियाएं आम तौर पर पारंपरिक अदालती कार्यवाही की तुलना में गोपनीय, कम औपचारिक और कम तनावपूर्ण होती हैं। अपनाई जाने वाली प्रक्रिया सरल, लचीली, गैर-तकनीकी और अनौपचारिक होती है। यह पक्षों को आगे के संघर्ष से बचाता है। अपील की आगे की आवश्यकता की संभावना को कम करता है तथा पक्षों के बीच अच्छे संबंध बनाए रखता है। इसके अतिरिक्त अपर जनपद न्यायाधीश / सचिय, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली एवं उ०प्र० राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ के निर्देशानुसार दिनांक 13-09-2025 को जनपद अम्बेडकरनगर में आयोजित होने वाली राष्ट्रीय लोक अदालत के बारे में भी बताया गया गया।

रमेश राम त्रिपाठी, चीफ, एल०ए०डी०सी०एस द्वारा विधिक जागरूकता / साक्षरता शिविर में उपस्थित विधि छात्र-छात्राओं को बताया गया कि विधिक सहायता रक्षा परामर्श प्रणाली का गठन विधिक सहायता प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत किया गया है इसका उद्देश्य न्याय तक सभी की पंहुच को सुनिश्चित करना है तथा ऐसे सभी लोगों को मुफ्त अघवा कम कीमत में कानूनी सहायता प्रदान करना है जो अपनी रक्षा करने में वित्तीय रूप से सक्षम नहीं हैं तथा उ०प्र० राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 की धारा 22बी0 के अन्तर्गत जन उपयोगी सेवाओं के अन्तर्गत स्थायी लोक अदालत का गठन किया गया है। स्थाई लोक अदालत के माध्यम से न्यायालयों में जो वाद अभी तक न्यायालय में नहीं आये हैं उन्हें स्थायी लोक अदालत में साधारण सा प्रार्थना पत्र देकर सुलह समझौते के माध्यम से मामले का निस्तारण कराया जा सकता है, स्थायी लोक अदालत में मामला दर्ज करने के लिये को शुल्क नहीं लगता, स्थायी लोक अदालत का फैसला न्यायालय की डिकी के समान होता है, जिसके विरूद्ध किसी भी न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती, चीफ, एल०ए०डी०सी०एस द्वारा उपस्थित प्रतिभागियों को बताया गया कि यदि किसी को किसी मी प्रकार की विधिक सहायता या जानकारी चाहिए तो राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली द्वारा संचालित टोल फ्री हेल्पलाईन नम्बर-15100 पर कॉल कर तत्काल विधिक सहायता व जानकारी प्राप्त कर सकते है या राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली द्वारा संचालित एल०एस०एम०एस० पोर्टल के माध्यम से भी आप अपनी समस्याओं का निदान कर सकते है।

शरद पाण्डेय, असिस्टेंट, एल०ए०डी०सी०एस० द्वारा बताया गया कि प्री-लिटिगेशन स्तर पर विवादों के निस्तारण की प्रक्रिया पारम्परिक अदालती कार्यवाही की तुलना में गोपनीय कम औपचारिक तथा सरल व लचीली तथा गैर तकनीकी होती है यह पक्षों को आगे के संघर्षों से बचाती है, विवादों का निस्तारण शीघ्र होता है तथा यह प्रक्रिया पक्षों के मध्य सौहाईपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखती है।