ओ३म्
“डी.ए.वी स्कूल एवं कालेज के प्रथम आचार्य ऋषि दयानन्द के भक्त महात्मा हंसराज जी को आज 161 वीं जयन्ती पर श्रद्धांजलि”
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आज 19 अप्रैल, 2025 को ऋषि दयानन्द जी के शिक्षा विषयक विचारों को बालकों व युवाओं में प्रचार व प्रसार के लिए अपना जीवन अवैतनिक समर्पित करने वाले महात्मा हंसराज जी की 161 वीं जयन्ती है। महात्मा हंसराज जी ने महर्षि दयानन्द जी की स्मृति में स्थापित दयानन्द एंग्लोवैदिक शिक्षा संस्थान के लिये अपना जीवन दान दिया था। डी.ए.वी. शिक्षा संस्थान आज देश भर में लाखों युवक-युवतियों को बाल स्तर से स्नात्कोत्तर स्तर तक की शिक्षा सहित इंजीनियरिंग एवं एम.बी.ए. आदि की भी शिक्षा प्रदान कर रहा है। डी.ए.वी. विद्यालयों में पढ़ने वाले सभी बालक व युवक ऋषि दयानन्द, आर्यसमाज एवं महात्मा हंसराज जी के विचारों से भी परिचित होते हैं। डी.ए.वी स्कूलों के माध्यम से लाखों वा करोड़ों युवक व युवतियां महर्षि दयानन्द और महात्मा हंसराज जी के जीवन से परिचित होती हैं। यह वर्तमान समय में आर्यसमाज के लिये महत्वपूर्ण एवं गौरव की बात है। आज महात्मा जी की जयन्ती पर हम डा. भवानीलाल जी के महात्मा जी के परिचय में लिखे कुछ शब्दों को उनकी पुस्तक ‘आर्य लेखक कोष’ से प्रस्तुत कर रहे हैं।
आर्यसमाज के महान् शिक्षाविद् तथा त्याग एवं तपस्या की मूर्ति महात्मा हंसराज का जन्म पंजाब के होशियारपुर जिले के बजवाड़ा नाम के एक कस्बे में 19 अप्रैल 1864 को हुआ। इनके पिता का नाम लाला चुन्नीलाल तथा माता का नाम श्रीमती हरदेवी था। सन् 1885 में इन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। स्वामी दयानन्द की स्मृति में लाहौर में डी.ए.वी. कालेज की स्थापना का निश्चय आर्यसमाज लाहौर ने किया तो लाला हंसराज ने इस संस्था की सेवा हेतु स्वयं को प्रस्तुत किया। जून 1886 को डी.ए.वी. हाई स्कूल की जब स्थापना हुई तो हंसराज उसके अवैतनिक आचार्य बने। बाद में यह संस्था कालेज के रूप में प्रोन्नत की गई तो वे ही उसके प्राचार्य बने और 1912 तक इस पद पर रह कर कालेज के विकास में अपना योगदान करते रहे। 1912 में उन्होंने कालेज के प्राचार्य पद से अवकाश ले लिया तो उन्हें डी.ए.वी संस्थाओं की प्रबन्ध समिति का अध्यक्ष चुना गया। इस पद पर भी वे कई वर्षों तक रहे। उधर आर्यसमाज के संगठन में भी महात्मा जी का अंशदान कम नहीं था। आर्य प्रादेशिक प्रतिनिधि सभा की स्थापना से लेकर स्व जीवन पर्यन्त महात्मा जी इस सभा के द्वारा आर्यसमाज के प्रचार एवं प्रसार में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। 15 नवम्बर 1938 को लाहौर में आपका निधन हुआ। महात्मा हंसराज कुशल लेखक भी थे।
महात्मा जी के लेखकीय कार्यः
1 The Great Seer or the Interpretation of the Vedas by Swami Dayanand.,
2 The Vedas as interpreted by Swami Dayanand (1917) – इसका उर्दू अनुवाद स्वामी दयानन्द का वेद अर्थ शीर्षक से छपा (1917),
3 ऋषि दर्शन (पूजा धर्म) 1979 विक्रमी,
4 ऋषि दर्शन (गृहस्थ-धर्म) 1924 विक्रमी,
5 मोतियों का हार (उर्दू) धर्मोपदेश – लेखों एवं व्याख्यानों का संग्रह (1917),
6 सन्ध्या पर व्याख्यान (1980 विक्रमी)-हिन्दी और उर्दू दोनों में छपी,
7 राय बहादरु मूलराज की दश प्रश्नी की समीक्षा (4 नवम्बर 1931),
8 मानव संग्रह (1890),
9 मानव-धर्म सार – सम्पादित (1980 विक्रमी) (मनस्मृति का पाठ्योपयोगी संस्करण),
10 धर्म उपदेशमाला (खुशहालचन्द खुर्सन्द द्वारा सम्पादित),
11 क्या हिन्दू मजहब जवाल पर है? मुरलीमनोहर (अफगानिस्तान में धर्म पर बलिदान होने वाले एक अज्ञात वीर की जीवनी)
पं. राजेन्द्र जिज्ञासु जी, अबोहर ने अप्रैल, 1986 में ‘महात्मा हंसराज ग्रन्थावली’ का प्रकाशन महात्मा जी के सभी ग्रन्थों को 4 खण्डों में उनकी उर्दू पुस्तकों के अनुवाद सहित आर्य साहित्य के प्रसिद्ध एवं प्रमुख प्रकाशक ‘गोविन्दराम हासानन्द, दिल्ली’ के द्वारा किया है। इस ग्रन्थावली का प्रथम खण्ड महात्मा हंसराज जी की विस्तृत जीवनी ‘तपोनिधि महात्मा हसंराज’ नाम से है जिसमें 231 पृष्ठ हैं। इस ग्रन्थावली के प्रकाशन से पं. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने प्रशंसनीय कार्य किया है। इस कार्य के लिये जिज्ञासु जी समस्त आर्यजगत् की ओर से अभिनन्दन के पात्र हैं। आज महात्मा हंसराज जी की जयन्ती के अवसर हम उनको अपने श्रद्धसुमन अर्पित करते हैं।
-मनमोहन कुमार आर्य