अनुराग लक्ष्य, 2 अप्रैल
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता।
ख़ुशी कब ग़म में बदल जाए कोई ठीक नहीं,
जश्न मातम में बदल जाए कोई ठीक नहीं।
हम सब एक साथ मिलते हैं खुशनसीबी है,
कब कहां कौन बिछड़ जाए कोई ठीक नहीं ।।
(1)-“लगा था कुंभ, नहाने गये थे चल करके,
कई शहरों से, कई गाँव से निकल करके,
(2)-मचा भगदड़, तो हुआ जान बचाना मुश्किल,
ना जानें कितने मरे, पाँव से कुचल करके,
लगा था कुंभ,,,,,
(3)-जिन्हें मतलब ही नहीं,कुछ है दुनियादारी से,
ये,वहाँ नाच रहे थे, उछल उछल करके,
लगा था कुंभ,,,,
(4)-किसी ने तन को ढका था, तो कोई नंगा था,
कहीं बहुरुपिये थे, भेष को बदल करके,
लगा था कुंभ,,,
(5)-लोग कहते हैं कि, अफवाह,खबर झूठी है,
ओ,हादसा जो, कई बार हुआ जल करके,
लगा था कुंभ,,,
(6)-भला हरबार क्युँ, वादे से मुकर जाते हैं,
हिसाब दे ना सके, आजतक ओ हल करके,
लगा था कुंभ,,,,
(7)-झोलियाँ जिनकी भरी,लौटे दुआँये लेकर,
बिछड़ गया जो, रो रहा था हाँथ मल करके,
लगा था कुंभ,,,
(8)-कलम भी रो पड़ी, आँखों में अश्क भर आये,
गुजर गई थी रात, करवटे बदल करके,
लगा था कुंभ,,,
(9)-दर्द लिखता नहीं तो, और भला क्या करता,
ना दिल को रोक सका,रह गया मचल करके,
लगा था कुंभ,,,,
(10)-कभी भी वक्त बुरा, बोलकर नहीं आता,
रामजी, पाँव को,रखना जरा सम्भल करके,
लगा था कुंभ,नहाने गये थे चल करके,
ना जाने कितने मरे,पाँव से कुचल करके,✍🏻