“वैदिक विषयों के अधिकारी विद्वान एवं अनेक महत्वपूर्ण प्रतिष्ठित पदों को सुशोभित करने वाले ऋषिभक्त डा. महावीर अग्रवाल जी नहीं रहे”

ओ३म्
“वैदिक विषयों के अधिकारी विद्वान एवं अनेक महत्वपूर्ण प्रतिष्ठित पदों को सुशोभित करने वाले ऋषिभक्त डा. महावीर अग्रवाल जी नहीं रहे”
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कुछ समय पहले गुरुकुल पौंधा-देहरादून के पूर्व स्नातक डा. शिवदेव आर्य जी की एक व्हटशप स्टेटस पोस्ट से जानकारी मिली की गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार के पूर्व प्रोफेसर एवं प्रो. वाइस चांसलर रहे डा. महावीर अग्रवाल जी का आज दिनांक 17-3-2025 को बंगलौर में अपने ज्येष्ठ पुत्र के निवास स्थान पर निधन हो गया है। उनके परिवार में उनकी धर्मपत्नी एवं दो पुत्र हैं। उनके एक पुत्र रुड़की में रहते हैं।

डा. महावीर जी का लगभग चार महीने पूर्व सिर में ट्यूमर का आपरेशन हुआ था। स्वास्थ्य पूरी तरह ठीक न होने तथा हरिद्वार में शीत का प्रभाव अधिक होने के कारण वह बंगलौर में अपने पुत्र के पास चले गये थे। वहां भी उनका स्वास्थ्य ठीक न हो सका और आज उनकी दुःखद मृत्यु हो गई। इस समाचार को डा. शिवदेव आर्य, हरिद्वार से सुनकर हमें अत्यन्त दुःख हुआ। हमने विगत तीन-चार दशकों में अनेकों बार आचार्य डा. महावीर जी के दर्शन करने सहित देहरादून के आर्यसमाज एवं गुरुकुल पौंधा में उनके उपदेशों वा प्रवचनों को सुना था। तीन चार दशक पूर्व वह माह में एक बार आर्यसमाज धामावाला, देहरादून में प्रवचनों के लिये आते थे। सन् 2000 में देहरादून में गुरुकुल पौंधा की स्थापना के बाद से भी वह गुरुकुल के उत्सवों एवं विशेष आयोजनों में भी आया करते थे जिनमें हमारी भी एक श्रोता व दर्शक के रूप में उपस्थिति हुआ करती थी। गुरुकुल देहरादून के संस्थापक स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी आचार्य महावीर जी के गुरुकुल झज्जर में विद्यार्थी जीवन में सहपाठी रहे हैं। दोनों में परस्पर घनिष्ठता बनी रही है। इस कारण से भी आचार्य महावीर जी गुरुकुल पौंधा एवं गुरुकुल गौतमनगर, दिल्ली के उत्सवों में उपदेश एवं वेद पारायण-यज्ञ के ब्रह्मा के रूप में आमंत्रित किये जाते थे। आचार्य महावीर जी को हमने गुरुकुल गौतमनगर, दिल्ली में यज्ञ के ब्रह्मा एवं वक्ता व उपदेशक के रूप मे भी अनेक बार सुना है। हरिद्वार में भी गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के अप्रैल में बैसाखी के अवसर पर होने वाले उत्सवों में भी हमने उनके अनेक बार उनके दर्शन करने सहित आचार्यजी के उपदेशों का श्रवण किया है। लगभग दो दशक पहले जब उन्होंने डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की थी तो गुरुकुल के उत्सव में उन्हें उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री सत्यानन्द रेड्डी जी ने उन्हें एवं एक अन्य वैदिक विद्वान डा. सत्यव्रत राजेश जी को सम्मानित किया था, उस आयोजन में हम भी उपस्थित थे। गुरुकुल गौतमनगर दिल्ली के एक उत्सव की समाप्ति पर हम आचार्य महावीर जी के साथ कार में गुरुकुल से नई दिल्ली स्टेशन पहुंचे थे और वहां से हरिद्वार की रेलगाड़ी की यात्रा उनके साथ की थी। इस बीच हमें उनसे वार्तालाप करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ था। आचार्य जी गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार एवं प्रो. वाइस चान्सलर के पदों पर कार्य करने के बाद अवकाश ग्रहण किया था। इसके बाद वह उत्तराखण्ड संस्कृत एकादमी के उपाध्यक्ष बने थे। इनके इस कार्यकाल में ही उत्तराखण्ड राज्य में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का गौरव प्राप्त हुआ। उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय में भी कुलपति के रूप में आपने कार्य किया। पंतजलि योगपीठ के अन्तर्गत संचालित पतंजलि विश्वविद्यालय में भी आपने प्रति-कुलपति के रूप में कार्य किया है। आचार्य महावीर जी भारत के राष्ट्रपति से वैदिक विद्वान् के रूप में भी आदृत वा सम्मानित थे।

आचार्य महावीर जी का अध्ययन अत्यन्त विशाल था। वह जब उपदेश करते थे तो उनके उपदेश में मन स्वतः स्थिर हो जाता था और अनेक नयी बातें सुनने के साथ सिद्धान्तों पर वह जिन उदाहरणों व घटनाओं का उल्लेख करते थे, उन्हें सुनकर आनन्द आता था। वह ऋषि दयानन्द की विचारधारा को प्रचारित करने वाले एक अधिकारी एवं मूर्धन्य विद्वान थे। ऐसे व्यक्ति का अचानक मृत्यु का समाचार सुनकर दुःख होना स्वाभाविक है। हम आचार्य महावीर जी को अपनी आत्मा की गहराई से श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर उन्हें सद्गति, शान्ति वा मोक्ष प्रदान करें और उनके परिवारजनों को इस दुःख को सहन करने की शक्ति दें।

डा. भवानीलाल भारतीय जी ने अपनी पुस्तक आर्य लेखक कोष में आचार्य डा. महावीर जी का परिचय दिया है। उन्होंने लिखा है कि डा. महावीर जी का जन्म महाराष्ट्र प्रान्त के भण्डारा जिले के ग्राम पलसगांव (सोनकी) में श्री ताराचन्द आर्य के यहां 9 अक्टूबर 1951 को हुआ था। इनकी शिक्षा गुरुकुल झज्जर तथा गुरुकुल विश्वविद्यालय कागड़ी में हुई जहां से इन्होंने संस्कृत में एम.ए. किया। मेरठ विश्वविद्यालय से ‘वाल्मीकीय रामायण में रस विमर्श’ शीर्षक विषय पर शोध कार्य करने के उपरान्त आपको पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त हुई। डा. महावीर जी ने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में रीडर के पद पर भी कार्य किया। इन्होंने वैदिक साहित्य में भी आपने एम.ए. किया था। ऋषि दयानन्द तथा वेद विषयक आपके अनेक शोध’पूर्ण निबन्ध विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। ‘संस्कृत गद्य लतिका’ शीर्षक पुस्तक का आपने सम्पादन किया था। ओ३म् शम्।

आचार्य डा. महावीर अग्रवाल जी हमारी पुनः विनम्र श्रद्धांजलि।

-मनमोहन कुमार आर्य