गीत
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खुशियों के बदले में मुझको, केवल गम उपहार मिला।
प्रेम तलाशा जब जब मैंने, नफरत का अंबार मिला।
माना जिसको हमने अपना, छोड़ा उसने साथ यहांँ।
शूल भरी है राहे अपनी, जाए फिर ये सखी कहांँ।।
दीपक जैसी जली यहांँ मैं मुझको बस अंधकार मिला
प्रेम तलाशा जब जब मैंने ,नफरत का अंबार मिला।।
मधुबन सारा हरा भरा है, फिर भी तन्हा रहती हूंँ।
प्यासी नदिया के जैसी मैं ,अविरल बहती रहती हूंँ।।
जाने कितना ढूंढ़ा मैंने, पर ना सुख का सार मिला
प्रेम तलाशा जब जब मैंने, नफरत का अंबार मिला।।
नहीं साधना पूरी होती, कितनी कोशिश करती हूंँ।
जिसने मुझ से नफरत की है ,उस पे ही मैं मरती हूंँ।।
त्याग तपस्या ही जीने का, मुझको है आधार मिला
प्रेम तलाशा जब जब मैंने, नफरत का अंबार मिला।।
रात दिना ग़म की नदियां में कितने गोते खाती हूँ।
दर्द उभरते जितने दिल में सबके सब पी जाती हूँ।।
सोचा था खुशियां महकेगी पर सूना संसार मिला
प्रेम म तलाशा जब जब मैंने, नफरत का अंबार मिला।।
अंजना सिन्हा “सखी ”
रायगढ़