उन्मुक्त उड़ान मंच पर 10 फ़रवरी से 15 फ़रवरी के मध्य वैलेंटाइन डे भारतीय संस्कृति में मनाया जाना चाहिए या नहीं( पक्ष और विपक्ष )विषय पर मंच की अध्यक्षा आदरणीय डॉ दवीना अमर ठकराल देविका जी के बेहतरीन मार्गदर्शन एवं सुनील भारती आज़ाद सौरभ के संचालन में साप्ताहिक आयोजन का सुन्दर आगाज और समापन हुआ, जिसमें विभिन्न साहित्यकारों ने प्रतिभाग कर इस आयोजन को भव्य रूप प्रदान किया |
वैलेंटाइन डे जो कि विश्वभर में प्रेम और स्नेह का प्रतीक माना जाता है। हर वर्ष 14 फरवरी को इसे विशेष रूप से युवा वर्ग के बीच उत्साह के साथ मनाया जाता है। हालांकि, भारतीय समाज में इसे लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलती हैं। कुछ लोग इसे आधुनिकता और प्रेम के उत्सव के रूप में स्वीकार करते हैं, तो कुछ इसे भारतीय संस्कृति पर पश्चिमी प्रभाव के रूप में देखते हैं। ऐसे में यह विचारणीय है कि क्या वैलेंटाइन डे भारतीय संस्कृति के अनुरूप सही है या गलत?अपने अमूल्य विचारों के माध्यम से लेखकों ने इस विषय की सार्थकता को सही एवं सटीक मार्गदर्शन दिया.
लेखकों का मानना है कि भारतीय संस्कृति में प्रेम को हमेशा पवित्रता और सम्मान के साथ देखा गया है। हमारे पौराणिक ग्रंथों और धार्मिक कथाओं में प्रेम के विभिन्न रूपों को महत्व दिया गया है। श्रीकृष्ण और राधा का दिव्य प्रेम, राम और सीता का आदर्श प्रेम, सावित्री और सत्यवान की निष्ठा—ये सभी उदाहरण दर्शाते हैं कि भारतीय संस्कृति में प्रेम केवल आकर्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें त्याग, निष्ठा और आत्मीयता का महत्व अधिक है।इसके अलावा, भारत में पहले से ही प्रेम और दांपत्य जीवन को समर्पित कई त्योहार मौजूद हैं, जैसे कि बसंत पंचमी, करवा चौथ, हरितालिका तीज और वैवाहिक वर्षगाँठ। ये पर्व प्रेम और समर्पण के भाव को उजागर करते हैं और भारतीय समाज के मूल्यों के अनुरूप भी हैं |
एक लेखक और कवि की दृष्टि से वैलेंटाइन डे साहित्य प्रेम, संवेदना और मानवीय भावनाओं का दर्पण होता है।जो लेखकों ने अपने विचारों से परदर्शित कर दिया,एक लेखक और कवि की दृष्टि से वैलेंटाइन डे प्रेम का सीमित दायरा नहीं – हिंदी साहित्य के कई कवि और लेखक प्रेम को केवल एक दिन तक सीमित नहीं मानते। महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, सूरदास और मीरा के काव्य प्रेम को ईश्वरीय और अनंत मानते हैं। उनके अनुसार प्रेम किसी विशेष दिन का मोहताज नहीं, बल्कि यह आत्मा की गहराइयों से उपजा हुआ भाव है। दूसरा सच्चा प्रेम या केवल दिखावा?आधुनिक कवि और लेखक यह प्रश्न उठा सकते हैं कि क्या वैलेंटाइन डे वास्तव में प्रेम का उत्सव है, या केवल बाजारवाद द्वारा प्रचारित एक पर्व? हरिवंश राय बच्चन की पंक्तियाँ याद आती हैं –
“मधुशाला” में प्रेम का जो स्वरूप प्रस्तुत किया गया है, वह किसी दिन विशेष तक सीमित नहीं, बल्कि जीवनभर की अनुभूति है। और संस्कृति और प्रेम का संतुलन का भाव बताता है रामधारी सिंह दिनकर जैसे कवि प्रेम को त्याग और शौर्य से जोड़ते हैं। उनके अनुसार प्रेम केवल रोमांस नहीं, बल्कि समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा भी है। यदि वैलेंटाइन डे भारतीय मूल्यों के अनुरूप प्रेम और सम्मान को बढ़ावा दे, तो इसे नकारने का कोई कारण नहीं।समय के साथ बदलाव आवश्यक कुछ आधुनिक लेखक यह तर्क दे सकते हैं कि प्रेम और संस्कृति समय के साथ बदलते हैं। जैसे गुलजार और जावेद अख्तर की कविताएँ प्रेम की आधुनिक व्याख्या प्रस्तुत करती हैं, वैसे ही वैलेंटाइन डे को भी एक नये दृष्टिकोण से देखा जा सकता है।
वैलेंटाइन डे को लेकर सभी के विभिन्न दृष्टिकोण हैं। एक ओर यह प्रेम और सौहार्द का प्रतीक माना है, तो दूसरी ओर इसे पश्चिमी प्रभाव का हिस्सा समझा गया है। सही और गलत का निर्धारण पूरी तरह से व्यक्ति की सोच और उसके संस्कारों पर निर्भर करता है। यदि इसे मर्यादा, सम्मान और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ मनाया जाए, तो यह किसी भी संस्कृति के लिए हानिकारक नहीं है।हालाँकि, भारतीय समाज को अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी बनाए रखना चाहिए। प्रेम का उत्सव केवल एक दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे जीवनभर अपनाने की आवश्यकता है। इसलिए, यदि हम अपने पारंपरिक प्रेम पर्वों को भी महत्व दें और अपने संबंधों को सशक्त बनाने पर ध्यान दें, तो यह सही मायनों में हमारी संस्कृति के अनुरूप होगा |