अनुराग लक्ष्य, 15 फरवरी
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
साहित्य ने हमेशा समाज में समाज को अपनी लेखनी द्वारा भाईचारगी और मानवता का पाठ पढ़ाया है। जिससे समाज में निरंतर समरसता का वातावरण बना रहे। ऐसी ही लेखनी की जिम्मेदार कलमकार डॉक्टर यासीन मूमल आज की तारीख में किसी परिचय की मोहताज नहीं है और निरंतर कवि सम्मेलन और मुशायरे में अपनी भरपूर उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। प्रस्तुत है आज उनके कुछ कलाम,
अपनी हिम्मत की फुलझड़ियों के दम पर बच्चे
नाउम्मीदी की तारीकी दूर भगाते हैं
सीमाओं के रखवालों को सौ सौ बार नमन
दुश्मन के दिल में दहशत का बीज उगाते हैं
देश सुरक्षित कर सीमा पर ध्वज लहराएंगे
जग को रौशन कर ख़ुशियों का पर्व मनायेंगे
जिस घर मे अंधियारों का सन्नाटा पसरा है
दीप जलाकर उस घर में त्यौहार मनाएं हम
महलों के ऊंचे कंगूरों से मत उलझो अब
इनके नख़रे झोपड़ियों तक कभी न आएं तो
जगमग करते तारों को धरती पर लायेंगे
जग को रौशन कर ख़ुशियों का पर्व मनायेंगे
“मूमल” भारतवालों के दिल में वो जज़्बा है
नफ़रत के दर पे उल्फ़त के दीप जलाते हैं
वर्षों से जो चली आ रही उस परिपाटी से
मिलजुल कर आपस का सारा कलुष मिटाते हैं
दुखियों के हम जितने हैं वो कष्ट हटाएंगे
जग को रौशन कर ख़ुशियों का पर्व मनायेंगे।
डॉ यासमीन मूमल