वेद स्वाध्याय
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सामवेद मंत्र १६१० में परमेश्वर का विषय है। मंत्र निम्न है।
तुरण्यवो मधुमन्तं घृतश्चुतं विप्रासो अर्कमानृचु:।
अस्मे रयि: पप्रथे वृष्ण्यं शवोऽस्मे स्वानास इन्दव:।।
मंत्र का पदार्थ (शब्दार्थ) सामवेद भाष्यकार वेदमूर्ति आचार्य (डॉ०) रामनाथ वेदालंकार जी रचित:- सत्कर्मों में शीघ्रता करने वाले, विद्वान लोग मधुर आनन्द से युक्त, तेज व स्नेह को प्रवाहित करने वाले अर्चनीय इन्द्र परमेश्वर को पूजते हैं। उसी की कृपा से हमारे लिए ऐश्वर्य सर्वत्र फैला हुआ है, सुखों की वर्षा करने वाला बल भी फैला है, उसी से हमारे लिए अभिषुत किये जाते हुए आनन्द-रस हमें प्राप्त होते हैं।
भावार्थ:- जगदीश्वर ही हमें तेज, धन, बल, आनन्द आदि प्रदान करता है, इस कारण सबको श्रद्धापूर्वक उसकी वन्दना करनी चाहिए।
-प्रस्तुतकर्ता मनमोहन आर्य (२७-१-२०२५)