*वाटसप गुरुकुल कक्षा-८*आचार्य सुरेश जोशी

🚀🚀 ओ३म् 🚀🚀
*वाटसप गुरुकुल कक्षा-८*
गतांक से आगे……………. प्रिय स्वाध्याय शील पाठक गण! कल हमने * *ज्ञानकुंभ में ब्रह्माण्ड के तीसरे तत्व बुद्धि* के आठ प्रकारों का वर्णन किया।यह बुद्धि भी जड़ तत्व ही है ।जब परमात्मा की अनुपम देन इस बुद्धि का जीवात्मा जब उपयोग करता है तो इसके चमत्कार सामने आने लगते हैं। तब व्यक्ति *गंगा स्नान करे या न करे लेकिन लाखों- करोड़ों लोगों को *ज्ञानकुंभ में स्नान* कराने में समर्थ हो जाता है।
आज आपको हम *जड़ बुद्धि के सात गुणों* की जानकारी दे ते हैं वो भी प्रमाणों के साथ! ये प्रमाण है महान वैदिक विद्वान आचार्य कामंदक जी का।
*[१] शुश्रुशा* यह बुद्धि का पहला गुण है।शुश्रुषा यानि सुनने की इच्छा।जिस प्रकार पीने की इच्छा को पिपासा।खाने की इच्छा को बुभुक्षा,जीने की इच्छा को जिज्ञासा कहते हैं उसी प्रकार *वेदज्ञान,ऋषियों की वाणी के सुनने की इच्छा को सुश्रुषा* कहते हैं।आज सनातन धर्मियों व पौराणिक हि़दुओं में यह इच्छा मर चुकी है इसीलिए गंगा स्नान में शरीर के डुबकी लगाने की इच्छा बढ़ रही है।
*[२]श्रवण* यह बुद्धि का दूसरा गुण है। सुनने के लिए जो पुरुषार्थ किया जाता है।प्रयत्न किया जाता है उसका नाम है श्रवण।गोस्वामी तुलसी दास जी ने *श्री रामचरित मानस* में भी ज्ञानगंगा में ही स्नान करने की बात कही है हिंदुओं पढ़कर देख लो!ये प्रमाण है।
*मज्जन फल पेखिअ तत्काला,काक होय पिक बकहु मराला।।*
अर्थात् जो सत्स़ग की गंगा यानि *ज्ञानकु़भ* में नहाते हैं अगर कौए की प्रवृत्ति वाले मनुष्य हैं तो उनमें कोयल के गुण और बगुले की प्रवृत्ति वाले हैं तो वो हंस के गुण वाले हो जाते हैं।
मगर हिंदु स्वार्थ व संकीर्णता में अपने छोटे-छोटे ग्रंथ *श्री रामचरित मानस,हनुमान चालीसा व गीता* के उपदेश भी नहीं मानता तो वेदज्ञान तो बहुत दूर की बात है। दोष हिंदुओं का नहीं दोष उनके उन कथा वाचकों का है जो खुद इन किताबों से कथा करते हैं खुद भी आचरण नहीं करते!
*[३] ग्रहण* बुद्धि का तीसरा गुण है ग्रहण। जो ज्ञान मन लगाकर सुना जाता है अगर उसे ग्रहण न किया गया तो वह उपदेश,सत्संग जीवन के लिए भार बन जाता है।फिर वही बात हो जाती है कि मन में राम-राम बगल में छुरी।
*[४] धारण* बुद्धि का चौथा गुण है धारण करना।इसी गुण से ब्रह्मा से लेकर जैमुनि तक लोगों ने वेदज्ञान को अपने मस्तिष्क में धारण किया।आज का हिंदू भगवान से भी चालाकी करता है।साल भर पाप जी भर के करता है फिर किसी मंदिर के आगे कान पकड़कर,द़डवत प्रणाम कर, जल में डुबकी लगाकर, सत्य नारायण की कथा कर,पंडित को दान देकर खुश हो जाता है कि अब तो पाप खत्म। पंडित भी दक्षिणा में लंबे- चौड़े आशीर्वाद देकर यजमान के अहंकार को ओर खुश कर देता है।मगर जो शास्त्रों की बातों पर *चिंतन-मनन कर उन्हें धारण नहीं करते!* उनके दु:ख कोरे कर्मकांड से नष्ट नहीं होते!
*[५] ऊहापोह* यह बुद्धि का पांचवां गुण है।इसका मतलब है कि विद्वानों की बात को *धन-निरंकार,राधे-राधे,सत्यवचन महाराज,जै भगवान जी,बोलो सद्गुरु भगवान की,वेद माता की जय* कहकर मत मानो।पहले सुनो! फिर एकांत में बैठकर चिंतन करो कि सही क्या है? फिर शंका-समाधान करो! तब जाकर उस बात पर आचरण करो इस बुद्धि का नाम है ऊहापोह!ऐंसा व्यक्ति अपनी व पराई समस्याओं का समाधान चुटकी बजाते कर देता है।
*[६] सिद्धान्त रक्षा* यह बुद्धि का छठा गुण है सज्जनो!एक उदाहरण से समझो! मुसलमान कहते हैं *सब खुदा की मर्जी* पौराणिक हिंदुओं ने भी मुसलमानों की नकल करके कहना शुरु कर दिया है कि *सब हनुमान जी की,राम जी की,महाकाल की मर्जीं!*
अब देखो! सिद्धांत कहता है ईश्वर भी अपनी मर्जीं से कुछ नहीं करता।वो सर्वशक्तिमान तो है मगर अपने नियम नहीं तोड़ता! क्या ईश्वर अपनी मर्जी से दूसरा ईश्वर बना देगा? क्या ईश्वर खुद को मार देगा? क्या ईश्वर समय से पहले संसार को नष्ट कर देगा? इसका उत्तर है नहीं! ईश्वर भी अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर सकता।उसने जो नियम बनाये हैं उसका पालन वह भी करता है।बुद्धि के इस गुण का नाम है सिद्धांत रक्षा!
*[७] तत्वज्ञान* यह बुद्धि का अंतिम और सातवां गुण है।वेद शास्त्र व विद्वानों के प्रवचनों के सार,रहस्य को समझ लेना ही तत्वज्ञान है।ये तत्व तीन हैं।ईश्वर,जीव व प्रकृति।ये तीनों अनादि हैं।आचार्य कामंदक कहते जिसकी बुद्धि में ये सातगुण हैं वो किसी *मंदिर,मस्जिद,गुरुद्वारा,चर्च,मठ,मजार,दरगाह,तीर्थों* में नहीं भटकता।उसे इंसान के बनाए *मंदिरों में नहीं भगवान के बनाए मन-मंदिर* में भगवान मिल जाते हैं और वो संसार बंधन से मुक्त हो जाते हैं। आचार्य कामंदक ने अपने *कामन्दक नीति शास्त्र* ४/२ में बुद्धि के इन सात गुणों को एक श्लोक बनाकर इस प्रकार लिखा है।
*शुश्रुषा श्रवण चैव ग्रहणं धारणं तथा।*
*ऊहापोहार्थं विज्ञाने तत्वज्ञानं च धी गुणा:।।*
अर्थ ऊपर किया जा चुका है।
🌹*दिब्य संदेश*🌹
यदि भारत के वर्तमान *शंकराचार्यों,कथा वाचकों,महा-मंडलेश्वरों,सद् गुरुओं* ने आचार्य कामन्दक की बात को हिंदुओं कै बताया होता तो आज जो *हिंदू-हिंदुओं के पाखंडवाद,जातिवाद,मत-मतांतरों,नये-नये भगवानों से ऊबकर* पलायन कर *ईसाई,बौद्ध,मुसलमान,वामप़थी* बन रहा हे वो रुक जाता।आज भी इसका एक ही समाधान है *वेदों की ओर लौटो !* इससे आगे की चर्चा कल………………..
आचार्य सुरेश जोशी
*वाटसप गुरुकुल महाविद्यालय* आर्यावर्त्त साधना सदन पटेल नगर दशहराबाग बाराबंकी उत्तर प्रदेश।