ग़ज़ल
बला की अब इमामत हो रही है,
कि लफ़्ज़ों की तिजारत हो रही है।
सफ़र जापान का हो,चीन का हो,
महज़ ओछी सियासत हो रही है।
नज़र है भेड़ियों की उन घरों पर,
जहां तेरी तिलावत हो रही है।
कि खाता देख लो सत्तर बरस का,
महज़ हम से शरारत हो रही है।
बहुत पाबंदियां हैं आज हम पर,
मगर तेरी इबादत हो रही है।
भरोसा टूट न जाए किसी दिन,
कि जर जर ये इमारत हो रही है।
कमी कोइ नदीम अपनी भी है जो,
ज़रा सी राई परबत हो रही है।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर ।