अनुराग लक्ष्य, 26 नवंबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता।
इतिहास साक्षी है तवारीख शाहिद है कि जब जब इस देश पर कोई आतंकी हमला हुआ है, या देश की एकता अखंडता पर दुश्मनों की निगाहें गड़ी हैं तो उनके मंसूबों और करतूतों पर सरकार ने इस पर करारा जवाब दिया है।
अब वह चाहे 1992 की आतंकी घटना bombay blost रहा हो या ताज होटल से शुरू हुई 26/11 का आतंकी हमला, जिसे आज भी याद करके हर भारत वासी स्तब्ध रह जाता है। चूंकि आज वही तारीख 26/11 हमारी नज़रों के सामने है। इसलिए कुछ टीसते ज़ख्मों की फिर याद ताज़ा हो गई है। मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी आज इसी दर्द को आपसे बांटने आया हूँ।
1/ दहशत गरों ने मौत का ढाया था वोह कहर,
शोलों की जद में आ गया मुंबई शहर ।
2/ जिस सिम्त नज़र जाती बारूद की खुशबू,
सांसों में घुल रहे थी इंसानों के ज़हर ।
3/ यूं करकरे का मरना है याद आज भी,
होकर शहीद कर गए खुद को यहां अमर ।
4/ कल तक बना था बादशाह आतंकियों का जो,
अब रास्ता उसको कोई आता नहीं नज़र ।
5/ दहशत ग़रों से मुल्क बचाना मेरे अल्लाह,
डूबे न आफताब यूं होती रहे सहर।
6/ छब्बीस को लिखा वक्त ने त्वारीख़ जो ,सलीम,
अब फिर कभी न आए दुबारा यहां नज़र ।