लोकजीवन में कवित्व एवं मुहावरें

लोकजीवन को यदि हम सामान्य रूप से परिभाषित करें तो इसका अर्थ हम आम जन जीवन से लगाते हैं। भारत के संदर्भ में देखें तो इस देश की अधिकांश जनसंख्या गांवों में बसती है। गांव ही भारतीय संस्कृति व सभ्यता की आत्मा है। यह सही है कि आज के इस वैज्ञानिक युग में लोगों के रहन-सहन, खान-पान तथा सोच विचार में परिवर्तन के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक आविष्कारों के कारण खेती किसानी के तरीके में भी परिवर्तन हुए हैं। मौसम संबंधी जानकारी तथा बीज की गुणवत्ता के विषय में हम ज्ञान विज्ञान के माध्यम से सहज ही जान सकते हैं।
अब यहीं पर यह प्रश्न उठता है कि जब हम आर्थिक तथा यांत्रिक रूप से इतने समृद्ध नहीं थे तो हम सभ्यता ,संस्कृति, कृषि तथा मौसम आदि के विषय में कैसे अनुमान लगाते थे ? जी हां, तब हमें इन पहलुओं का बोध लोक जीवन में प्रचलित कवित्व तथा मुहावरें करते थे। भारत के संदर्भ में देखे तो घाघ और भड्डरी के साथ न जाने कितने ऐसे गुमनाम कवि हुए जिनके कवित्व में जनजीवन से जुड़ी प्रायः हर तरह की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक ,धार्मिक, कृषि ,व्यापार वाणिज्य से जुड़ी भविष्यवाणियां समाहित है। ये कवित्व न केवल आम जन जीवन का मार्गदर्शन करते हैं अपितु उनकी हर छोटी बड़ी समस्याओं के समाधान ढूंढने में मदद करते हैं।
यदि हम कवि घाघ के कवित्व की बात करें तो इन्होंने नीति, जुताई बुवाई, सिंचाई,बैल भैंस और न जाने कितने आमजन से संबंधित उपयोगी विषयों के संदर्भ में लोगों को जागरूक किया है। जीवन के मूल्यपरकता और नीतिपरकता के संदर्भ में उनके इस कवित्व से समझ सकते हैं
भुइयां खेड़े, हर है चार।
घर होय गिहथिन,गऊ दुधार।।
रहर की दाल, जड़हने का भात।
पाकल नींबू,औ घिव तात।।
दही खाड़ जौ,घर में होय।
तिरछै नैन, परोसें जोय।।
घाघ कहै, सबहि है झूठा।
ऊहां छाड़ि, इहवै बैंकुण्ठ।।
अर्थात कवि का कथन है कि यदि खेत घर के पास हो, चार हलों की खेती हो, गृह कार्य में कुशल स्त्री हो, दूध देने वाली गाय हो, खाने के लिए अरहर की दाल, जड़हन चावल का भात रहे साथ ही साथ उसमें पके हुए नींबू का रस और घी मिला हो, घर में दही और खांड़
हो ,खाना को तिरछी आंखों वाली स्त्री परोसे तो स्वर्ग सुख की बातें झूठ है अर्थात ऐसे भाग्यवानों के लिए तो बैकुंठपुरी यहीं है।
खेती किसानी ग्रामवासियों का मुख्य पेशा है।ऊख गोड़ाई की रीति के विषय उनके इस कवित्व की सार्थकता को देख सकते हैं
ऊख गोड़ि के तुरत दबावै।
फिर तो ऊख बहुत सुख पावै।।
अर्थात ऊख की गोड़ाई करने के बाद उस पर मिट्टी डाल डाल देनी चाहिए, ऐसा करने से पैदावार अच्छी होती है।
विभिन्न फसलों को उनकी जरूरत के हिसाब से पानी की आवश्यकता होती है । घाघ ने कहा है
धान,पान औ केला। ये तीनों पानी के चेला।।
अर्थात धान,पान और केले की खेती के लिए अधिक पानी की आवश्यकता होती है। पानी के अभाव में यह फैसले कदापि नहीं हो सकती।
जिस प्रकार घाघ के कवित्व लोक के जुबान में बसते हैं। कुछ वैसे ही भड्डरी की रचनाएं लोगों के मनो मस्तिष्क में विद्यमान रहती हैं ‌। ज्यादातर लोग दोनों के कवित्व की शैली तथा विषय वस्तु एक जैसी होने के कारण अंतर ही नहीं कर पाते हैं। ऐसे में घाघ भड्डरी का नाम एक साथ लेते हैं। अकाल के लक्षण के संदर्भ में भड्डरी का कवित्व है कि
रात सफाई दिन को छाहीं ‌।
भड्डरी कहैं कि पानी नहीं।।
अर्थात यदि रात्रि के समय आकाश साफ हो और दिन के समय बादल घिर आवे और उनकी छाया पृथ्वी पर पड़े तो उनका कहना है कि ऐसी स्थिति में बारिश नहीं होती है। अनावृष्टि के साथ साथ उन्होंने वृष्टि के संदर्भ में भी वर्णित किया है
जेठ मास जो तपै निरासा।
तब होवें बरखा की आसा।।
अर्थात अगर जेठ के महीने में कड़ाके की गर्मी पड़े तो वर्षा होने की उम्मीद करनी चाहिए। खान-पान के शुभ अशुभ दिन के विषय में भड्डरी का कवित्व है
रवि को पान,सोम को दरपन,धनिया खावे भूमि के संग।
बुध को दही,गुरु को गुड़, शुक्रै राई , शनि को मामीरंग।
अर्थात् यात्रा से पूर्व रविवार को पान खाना, सोमवार को शीशे मे‌ देखना,मंगल को धनियां, बुध को दही, वृहस्पति को गुड़, शुक्र को राई तथा शनिवार को मामीरंग खाना शकुन होता है। इसी प्रकार अशुभ के विषय में अपना मत जाहिर करते हुए कहते हैं कि
सनमुख छींक लड़ाई भाखै।
पीठ पाछिली सुख अभिलाखे।।
छींक दाहिनी धन बिनसावे।
बाम छींक सुख सदा दिखावे।।
ऊंची छींक महा सुभकारी।
नीची छींक महाभयकारी।।
अपनी छींक सदा दुखदाई।
भड्डर जोसी कह समझाई।।
अर्थात् सामने की छींक से विग्रह,पीठ पीछे से सुख,दाहिनी ओर होने से धन का नाश और बायीं ओर से सुख मिलता है। ऊंची छींक शुभ और नीची छींक अशुभ होती है। अपना छींक सदा ही कष्टदायक होती है। ऐसा भड्डरी का वचन है।

ऐसे में कह सकते हैं कि लोकजीवन का कवित्व के साथ साथ मुहावरों से भी विशेष लगाव रहा है। जहां तक मुहावरा शब्द की बात है तो यह अरबी भाषा का शब्द है । इसका अर्थ है बातचीत करना।
आम बोलचाल में यह देखा जाता है कि लोग अपने बातों को प्रभावशाली ढंग से रखने के लिए इसका प्रयोग करते हैं। मुहावरा का अर्थ हम प्रायः अभिधा के आधार पर न लेकर लक्षणा तथा व्यंजना के आधार पर लेते हैं। आमजन में मुहावरों का प्रयोग साक्षर तथा निरक्षर दोनों सामान्य रूप से प्रयोग करते हुए देखे जा सकते हैं। जब हम कोई कार्य करना आरंभ करते हैं तो लोग आसानी से श्री गणेश करना कहते हैं‌। समाज में देखा जाता है कि जब लोग हैसियत से ज्यादा बात करते हैं तो लोग छोटा मुंह बड़ी बात कह कर उसकी यथार्थ स्थिति के विषय में अवगत कराते हैं । लोक में जब लड़ाई झगड़ा होता है तो कुछ लोग क्रोध में आकर कहते हैं कि तुम मेरा बाल भी बांका नहीं कर सकोगे अर्थात कुछ भी नहीं बिगाड़ पाओगे। विभिन्न प्रकार के प्रवचनों में मोह माया से मुक्ति कि जब बात की जाती है तो धन को हाथ की मैल अर्थात तुच्छ वस्तु बताया जाता है। लोगों को आवश्यकता से जब बहुत कम हासिल होता है तो ऊंट के मुंह में जीरा कहते हुए उस वस्तु की कमी को प्रदर्शित करते हैं। यह आमतौर पर देखा जाता है कि विभिन्न तरीकों से जब किसी व्यक्ति को कोई बात बार बार बताई जाती है और काफी मशक्कत के बाद जब वह समझ नहीं पाता तो उसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर या भैंस के आगे बीन बजाना कहकर हार मान लेते हैं। समाज में अधिकांश यह देखने को मिलता है कि लोग अपना काम निकालने के लिए मीठी बातें करते है और फिर भी अपना कार्य नहीं करवा पाते है तो उनके लिए दाल न गलने जैसे मुहावरे का प्रयोग किया जाता है।और ऐसे न जाने कितने मुहावरों का उपयोग हम अपने व्यवहारिक जीवन में देख सकते हैं।

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि ये कवित्व तथा मुहावरे लोक की अंतर चेतना सहज रूप से विद्यमान रहते हैं । जैसे दाल में नमक होने से उसका स्वाद बरकरार रहता है कुछ वैसे ही ये कवित्व तथा मुहावरे भी लोक जीवन की जीवंतता को सजोंए रखते हैं।
(आकाशवाणी गोरखपुर से प्रसारित)

नाम- नीरज कुमार वर्मा नीरप्रिय
किसान सर्वोदय इंटर कालेज रायठ बस्ती (उ.प्र.) 272148
मो. 8400088017