हरे -भरे लहलहाते उपवन
नदिया के कल -कल की सरगम
नभ में उड़ते खग विहंगम
कैसी सुंदर प्रकृति मनोरम।
फूलों पर मंडराते मधुकर
सुवासित पवन लगती सुखकर
कोयल कूके सुंदर वानी
बोले पपीहा मांँगे पानीं
करता मोर झूम के नर्तन
कैसी सुंदर प्रकृति मनोरम।
खिले सरोवर कमल शुभकर
नभ में छाये श्याम पयोधर
छम -छम बूंँदें आई धरा पर
उड़ा गोरी का आंँचल सर- सर
आनंदित हो रहा है तन -मन
कैसी सुंदर प्रकृति मनोरम।
अब न दिखे यह दृश्य सुहाने
यही विनाश मानव न जाने
दूषित धरा गगन भी दूषित
नदियों का जल हुआ प्रदूषित
बढ़ते धुएं से घुटता दम
कैसी सुंदर प्रकृति मनोरम।
जागो कि अभी उम्मीद है बाकी
नदियों में जल तरु पर फूल बाकी
वृक्ष लगाओ नदी बचाओ
जैव कृषि को फिर अपनाओ
सब मिल आओ समय है कम
कैसी सुंदर प्रकृति मनोरम।
स्व प्रमाणित मौलिक रचना
श्रीमती प्रियंका मिश्रा “कुमुद”
खासगी बाजार लश्कर ग्वालियर मध्य प्रदेश।