मेरी आंखों में है आंसू के सिवा कुछ भी नहीं।।

ग़ज़ल

मुझको इस राहे मोहब्बत में मिला कुछ भी नहीं।
मेरी आंखों में है आंसू के सिवा कुछ भी नहीं।।

साथ रहने की क़सम खाके अलग हो जाना।
इससे बढ़कर है मोहब्बत में सज़ा कुछ भी नहीं।।

दर्द ऐसा कि जिसे सहना बहुत मुश्किल है ।
ज़ख्म ऐसा के मिली जिसकी दवा कुछ भी नहीं।।

तेरे आने की उसी राह को तकते तकते।
सिर्फ आंसू के इन आंखों में बचा कुछ भी नहीं।।

बस वही दर्द वही ज़ख्म वही तन्हाई।
अपनी क़िस्मत में अभी तक है नया कुछ भी नहीं।।

क्या करूं किसको सुनाऊं मैं जुबा से हर्षित।
अपने आगे तो है मजनू की कथा कुछ भी नहीं।।

विनोद उपाध्याय हर्षित 

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