ईश्वरीय वाणी वेद 📚 आचार्य सुरेश जोशी

🍀 *ओ३म्* 🍀
📚 ईश्वरीय वाणी वेद 📚
🖊️ *कर्म+भोग समन्वय*🖊️
*ओ३म् मोघमन्नं विन्दते अप्रचेता: सत्यं ब्रवीमि बध इत् से तस्य।नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी।।*
🌻 *मंत्र का पदार्थ*🌻
📍 अप्रचेता: = बुद्धि -शून्य अर्थात् मूर्ख आदमी 📍 मोघम् अन्नम् = मुफ्त का भोजन, बिना कमाया हुआ भोजन 📍 विन्दते = पाने का यत्न करता है अर्थात अपने भोजन के लिए कुछ करना नहीं चाहता। 📍 न अर्यमणम् पुष्यति = जो अपने किसी हितैषी का पोषण नहीं करता। 📍 न सखायम् पुष्यति = और न अपने साथी का पोषण करता है। 📍 स: = उसका व्यापार 📍 तस्य = उसके 📍 वध:इत् = नाश का ही कारण है। 📍 केवलादि = जो अकेले खाने वाला है वह 📍केवलाघ:= केवल पाप का भागी 📍 भवति = होता है 📍सत्यम् ब्रवीमि = मैं सत्य कहता हूं अर्थात् इस कथन के सच होने में किंचित्मात्र भी सन्देह नहीं है।
🪭 *मंत्र की मीमांसा*🪭
कुछ लोग कहते हैं कि जब तक जिंदगी है खूब ऐश कर लो! *खाओ पीओ मौज करो* कल किसने देखा है क्या होगा।अपनी बात की पुष्टि में प्रमाण भी देते हैं।
(१) *अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम। दास मलूका कह गये सबके दाता राम।।*
(२) *होनी है जो होयगी अन होनी ना होय। प्रभु राम का नाम लो रहो खाट पर सोय।।*
इसके विपरीत कुछ लोगों को कहना है…..
(१) *कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।जो जस करै सो तस फ़ल चाखा*
(२) *सकल पदार्थ है जग माहीं।करम हीन नर पावत नाहीं।।*
अब इन दोनों बातों का समाधान परमात्मा ने ईश्वरीय वाणी वेद 📚 में कर दिया है।
*आओ इसका पता लगाएं!!*
जरा विचार करें क्या एक अध्यापक इसलिए अध्यापक कहलाता है कि *वह अध्यापन कार्य करता?* या इसलिए कि वह वेतन पाता है।एक डॉक्टर को आप इसलिए डाक्टर कहते हैं कि वह डाक्टरी करता है या *इसलिए कि वह इतना धन कमाता है?* एक सैनिक का नाम उसके कर्म के कारण हुआ या *उसके वेतन के कारण?* यदि जीविकोपार्जन कै ही मुख्य माना जाए तो सब एक से होंगे, विशेषता नहीं होगी।
परंतु समाज का ऐसा नियम नहीं है। रोगी व्यक्ति डाक्टर को उसके धन सम्पत्ति को देखकर नहीं *उसकी योग्यता* देखकर बुलाता है। मैं ऐसा डाक्टर बुलाऊं कि मेरा रोग ठीक हो जाए। ऐसे विचार हैं कर्म पर *यूनान के दार्शनिक प्लैटो* के
📘 *वेद वाणी* 📙

जब इतना निश्चित हो गया कि तो *भोग को कर्म* के अधीन रखना होगा और *कर्म को भोग के अधीन* नहीं। क्योंकि आधेय बिना आधार के नहीं रहता।
इसलिए वेद वाणी कहती है कि *मोघं अन्नं विन्दते अप्रचेता:* अर्थात् मुफ्त के खाने की इच्छा रखने वाला मूर्ख है । *कर्म की ही प्रधानता* है और कर्म की अवहेलना अथवा बिना कर्म के भोजन करने की इच्छा केवल प्रच्छन्न मूर्खता है।
*केवलाघो भवति केवलादी* मंत्र की समाप्ति पर उपदेश है परमात्मा का कि जो अकेले खाता है वो उसके पास पाप के शिवा कुछ भी शेष नहीं बचता। मतलब उसके पुण्य क्षीण हो जाते हैं। पुण्य के क्षीण होते ही सुखों का नाश हो जाता है।
हमारे ऋषियों को संदेश है कि अपने परिश्रम की कमाई को अकेले न खाकर उसे देकर खाओ! *देकर खाओ का ही नाम है दान* दान श्रद्धा से दो!🌸 अश्रद्धा से दो !🌸 शोभा से दो!🌸 लज्जा से दो!🌸 भय से दो! चाहे संकल्प से दो!🌸 देना ही देवता बनने का शास्त्र है।
सार यह निकला कि *भोग व कर्म का समन्वय* ही जीवन जीने की कला है।जो गृहस्थ अतिथि को *बिना खिलाये स्वयं खा लेता है* वह अपने घरों की 🌸🌸 श्री 🌸🌸 को खा जाता है अर्थात नष्ट कर देता है। इस प्रकार *त्याग पूर्वक भोग* में कर्म व भोग का समन्वय हो ही जाता है।
आचार्य सुरेश जोशी
🌸 वैदिक प्रवक्ता 🌸

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *