🌹ओ३म् 🌹
📚 ईश्वरीय वाणी वेद 📚
ओ३म् कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।
।। यजुर्वेद ४०/२।।
🌴 मंत्रार्थ 🌴
🪷 इस = इस संसार में 🪷 कर्माणि = कर्मों को 🪷 कुर्वन् = करते हुए ही मनुष्य 🪷 शतम् शमा: = सौ वर्ष तक। 🪷 जिजीविषेत् = जीने की इच्छा करें । 🪷 एवम् = यही एक साधन है जिसके द्वारा 🪷 त्वयि नरे = तुझ मनुष्य में कर्म लिप्त न होंगे। 🪷 इत: अन्यथा = इसके भिन्न दूसरा 🪷 न अस्ति= रास्ता नहीं है।
🕉️ मंत्र की मीमांसा 🕉️
जो लोग 🌸 भाग्यवादी🌸 हैं उनको ललकारते हुए वेद मंत्र चेतावनी दे रहा है कि संसार का बीज 🍁 केवल कर्म योग 🍁 ही है। यदि आपने अच्छे कर्म नहीं किए हैं तो जो भी आप *यज्ञ/तप/जप /तीर्थ/स्नान/ रुद्राभिषेक* आदि कर्म कर रहे हैं वो आपके कर्म फल को नष्ट नहीं कर सकते हैं।
*जैंसी कर्म वैसा फल।*
*आज नहीं तो निश्चय कल।।*
इसके बाद भी लोग अपने बचाव में ताना बाना बुनते रहते हैं। जैंसे!
*अगर करे ना चाकरी,पंछी करे न काम।*
*दास मलूका कह गये,सबके दाता राम!*
वास्तव में दास मलूका *सृष्टि विज्ञान* को जानते ही नहीं थे। अजगर को भोजन के लिए मुंह खोलना पड़ता है बिना मुख खोले उसके पास भोजन नहीं आता!जरा ईश्वर की न्याय व्यवस्था देखो! जब अजगर मुख खोलता है तो उसमें प्राणायाम शक्ति प्रकृति प्रदत्त है कि वह अपने भोजन को अपने श्वास की शक्ति से खींच लेता है।यह मुख खोलना ही उसका कर्म है यदि *इस कर्म को नहीं करेगा तो ईश्वर भी उसे भोजन* नहीं दे सकता।
रही बात पंछी (चिड़िया) की तो पक्षियां अपने भोजन के लिए प्रतिदिन क ई किलोमीटर की उड़ान भरती हैं *तब उनको भोजन* मिलता है।
हमारे धर्म शास्त्र कहते हैं!
*कर्म तेरे अच्छे तो किस्मत तेरी दासी है।* *नियत तेरी अच्छी तो घर ही मथुरा काशी है*।
वेद का सिद्धांत है कि * *आपको सुख दुख आपकी पूजा पाठ से नहीं आपके शुभ -अशुभ कर्मों* के फलस्वरूप मिलता है।पूजा पाठ तभी काम करेगी जब कर्म पवित्र होंगे! आपने इतिहास में पड़ा होगा शंकर जी को अपने शीश काटकर चढ़ाने वाला रावण *शिव भक्त रावण* आज भी दुनिया में *राक्षस* इस नाम से जाना जाता है और दूसरी ओर *वल्कल वस्त्र, लकड़ी के खड़ाऊं पहनकर पैदल जंगलों* की धूल छानने वाले श्रीराम *भगवान राम* कहकर पुकारते हैं।
कर्म फल के सिद्धांतों को जानकर ही संसार में सुख पूर्वक जिया जा सकते हैं। कर्म फल के कुछ 🌳 स्वर्णिम सूत्र 🌳 इस प्रकार हैं।
(१) जैंसा कर्म वैसा फल।
(२) जिसका कर्म उसी का फल!
(३) जितना कर्म उतना ही फल न कम न अधिक।
(४) कर्म नहीं तो फल भी नहीं।
(५) अच्छे कर्म का अच्छा फल और बुरे कर्म का बुरा फल।
(६) मनुष्य केवल कर्म ही कर सकता है फल उसके हाथ में नहीं है।
(७) कुछ कर्मों का फल माता पिता तो कुछ कर्मों का फल आचार्य तो कुछ कर्मों का फल सरकार मगर १००% प्रतिशत कर्मों का फल तो *केवल ईश्वर* ही देता है। इसीलिए इसको *ईश्वरीय वाणी वेद* कहा जाता है।
आचार्य सुरेश जोशी
🏵️ वैदिक प्रवक्ता 🏵️