🌾 *ओ३म्*🌾
📚 ईश्वरीय वाणी वेद 📚
*ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव । यद्भद्रं तन्न आसुव।।*
।। ऋग्वेद ५/८२/५।।
🌱 *मंत्र का पदार्थ*🌱
[ देव सवित: ] हे प्रेरक देव ! [ विश्वानि ] सब [ दुरितानि ] बुराइयों को [ परा सुव ] दूर कीजिए। [ यत् ] जो [ भद्रम् = ( स्यात ) ] कल्याण कारक वस्तु हो [ तत् ] वह [ न: ] हमारे लिए [ आसुव ] दिलाइए।
🥝 *मंत्र की प्रेरणा*🥝
इस मंत्र में तीन पद विशेष हैं जो विचारणीय व अनुकरणीय हैं। *सविता+ दुरित + भद्र*।
प्रथम पद हैं *दुरित* मार्ग में जो भी कुछ बाधाएं उपस्थित होती हैं वे सब दुरित हैं। मंजिल एक है।मार्ग भी एक है परंतु दुरित बहुत है । बचपन के अनेक रोग आपके मार्ग को रोकते हैं ये दुरित हैं।बड़े होने पर जिस काम में हाथ डालते हैं उसमें सही ज्ञान न होना, आलस्य,लोभ, दूसरों का हस्तक्षेप ये सभी दुरित हैं। इन सभी दुरितों को कुछ हद तक आप पुरुषार्थ से दूर कर सकते हैं मगर १००% दुरितों को बिना भगवान की कृपा के दूर नहीं कर सकते!
दूसरा शब्द *भद्र* है। जीवन में कोई रुकावट न हो ! रुकावट के न होने पर जो स्थिति होती है उसी का नाम है *भद्र* भद्र अर्थात् हमारे लिए जो भी कल्याणकारी हो ! कल्याण क्या है कहते दुरित अर्थात् दुःख दूर हो जाना ही कल्याण है।
तीसरा शब्द है *सविता* सविता का अर्थ सूर्य भी होता है। सूर्य में प्रकाश होता है और वह प्रकाश परमात्मा ही सूर्य को देता है इसलिए इस मंत्र में सविता का अर्थ प्रकाश तो है मगर सूर्य का प्रकाश नहीं परमात्मा का प्रकाश *परमात्मा का प्रकाश ज्ञान का प्रकाश* है जीवात्मा के दुःख तभी दूर होंगे जब उसे ज्ञान का प्रकाश प्राप्त होगा।
*जाको प्रभु दारुण दुःख दीन्हीं*
*वाकी मति पहले हरि लीन्हीं।।*
इस प्रकार इस मंत्र में *ईश्वर से प्रार्थना करके सहायता मांगी है* कि हे ईश्वर आप अपनी कृपा व हमारे पुरुषार्थ के फल स्वरूप हमारे समस्त *दुर्गुण -दुर्व्यसन और दुःखों* को दूर कर दीजिए और जो *उत्तम गुण कर्म और स्वभाव हैं* उन्हें दूर कर दीजिए!
आचार्य सुरेश जोशी
*वैदिक प्रवक्ता*