पत्रकारिता दिवस पर विशेष
पत्रकारिता के अतीत पर इक नज़र
मैं हूं शायर जमाना, मेरा और है फसाना।
तुम्हें फिक्र अपने घर की, मुझे हर गली का गम है।।
हबीब जालिब की ये पंक्तियां साहित्यकार तथा पत्रकार के व्यापक नजरियें और जिम्मेदारियों की ओर संकेत करती हैं। किसी भी पत्रकार की पत्रकारिता में ऊंचाई तभी आती है जब उसके हृदय में किसी भी घटना तथा मुद्दों को लेकर एक संवेदनशीलता हो। घटना को मात्र तथ्यों के साथ प्रस्तुत कर देना एक अंक गणितीय कार्य है। उस घटना के सकारात्मक तथा नकारात्मक पहलू क्या है? उसमें आमजन का क्या हित निहित है? वह समाज तथा देश को किस दशा में ले जा रही है? इसकी पड़ताल यदि पत्रकार निष्पक्ष ढंग से करता है तो उसकी पत्रकारिता निश्चय ही उस मुकाम को हासिल कर लेती है। जहां वह व्यक्ति, समाज तथा देश को दिशा देने की स्थिति में आ जाती है। यदि भारतीय हिंदी पत्रकारिता के अतीत पर नजर डालें तो इसका इतिहास गौरवपूर्ण रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पत्रकारिता में गहरी रचनात्मक का परिचय मिलता है। राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में यह न केवल राजनीतिक पहलू का वाहक बनी बल्कि समाजनीति, अर्थनीति तथा संस्कृति के विभिन्न पहलुओं के संदर्भ में व्यापक विवेचन व विश्लेषण भी मिलता है। जनता का पत्रकारिता के प्रति भावात्मक तथा बौद्धिक लगाव रहा है। पुनर्जागरण के दौरान यह निष्ठा अपने चरम पर पहुंच गई। पर 1990 के दशक में जब उदारीकरण का दौर आया तो उससे पत्रकारिता की परिमाण में जहां वृद्धि हुई वहीं गुणात्मकता का ह्रास हुआ। व्यावसायिकता इस कदर हावी हुई कि पत्रकारिता अब समाचार तथा विचार का वाहक न होकर एक उत्पाद के रूप में परिवर्तित हो गया।
इस पत्रकारिता की गिरावट के विषय में सन् 1925 ईस्वी में हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद से बाबूराव विष्णुराव पराड़कर ने कहा था कि पत्र सर्वांग सुंदर होंगे। आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी, मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे, लेखों में विविधता होगी, कल्पकता होगी, गंभीर गवेषणा की झलक होगी और मनोहारी शक्ति भी होगी, ग्राहकों की संख्या लाखों में होगी। यह सब होगा, पर पत्र प्राणहीन होंगे। पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मभक्त अथवा मानवता के उपासक महाप्राण संपादकों की नीति न होगी। इन गुणों से संपन्न लेखक विकृत मस्तिष्क समझे जाएंगे। संपादक की कुर्सी तक उनकी पहुंच भी ना होगी। वेतन भोगी संपादक मलिक का काम करेंगे। वे हम लोगों से अच्छे होंगे। पर आज भी हमें जो स्वतंत्रता प्राप्त है, वह उन्हें न होगी।
वस्तुत: जिस प्रकार से हमारे समाज में जीवंतता का क्षय हुआ है उसी के अनुरूप पत्रकारिता की जीवनी शक्ति भी कम हुई है। एक दौर वह था जब समाचार पत्र या पत्रिका के कारण संपादक की पहचान नहीं होती थी। बल्कि संपादक के व्यक्तित्व तथा कृतित्व पत्रिका या पत्र को लोक जुबान पर प्रतिष्ठित करते थे। पर आज के समय में ऐसे संपादक मात्र गिने चुने ही रह गए हैं। एक संस्था के रूप में संपादक नाम की जो चीज थी उसकी गिरावट आप सहज ही देख सकते हैं। पत्रकारिता जगत में बड़े-बड़े व्यावसायिक घरानों के आगमन से अब संपादक की दृष्टिकोण तथा नजरियें की महत्ता न होकर उसका काम सिर्फ खबरों की मैनेजरी तक सीमित कर दिया गया है। जो कंटेंट ऊपर से पेश किए जाते हैं उसे मनोरंजन बनाकर पाठक या श्रोता रूपी उपभोक्ता के सामने उड़ेल देना ही उसका उद्देश्य हो गया है। संपादक की इस चेतना विहीनता का परिणाम यह निकला कि अब पत्रकारिता आत्माविहीन होती जा रही है। एक ही जैसी खबरों के पिष्टपेषण का परिणाम यह निकला कि अब समाचार नीरस तथा उबाऊ होने लगे हैं।
समाचार पत्र पत्रिकाएं और जितने भी मीडिया संस्थान है वह सभी दिल्ली वासी हो गए हैं। विकेंद्रित होने के वजाय उनका निरंतर केंद्रीकरण हो रहा है। यह कुछ वैसा ही जैसा हिंदी साहित्य के इतिहास में छायावाद काव्य धारा थी जो केवल इलाहाबाद तथा बनारस तक के ही कवियों तक सिमटी रह गई। फिर पाठक के मन में यह सवाल उठता है कि इसे संपूर्ण हिंदी क्षेत्र की काव्य धारा कैसे मानें? किसी भी उद्यान की शोभा यह होती है कि उसमें विविध रंग तथा प्रजातियों की फूल खिले हो। उनको पुष्पित तथा पल्लवित होने के लिए अनुकूल माहौल प्रदान किया जाए। पत्रकारिता के इस केंद्रीकरण का परिणाम यह निकला है कि कोई भी अकेला पत्रकार चाहे वह कितनी भी अच्छी पत्रकारिता क्यों ना करता हो? किसी भी पहलू को संपूर्ण ढंग से कवर नहीं कर सकता है। उसे अपने दायरे की यह समझ होनी चाहिए कि वह दिल्ली के एसी कमरे में बैठकर संपूर्ण घटनाक्रम पर निगाह नहीं रख सकता। किसी मुद्दे या घटना पर सिर्फ एक आदमी की बोलने या लिखने से बेहतर यही है कि उस मुद्दे तथा घटना पर विविध पत्रकार बोलें व लिखें। उसे अपने दिल्ली वासी तथा एको अहम् द्वितीयों नास्ति की भावना पर नियंत्रण रखते हुए सभी को महत्व देना होगा।
वर्तमान पत्रकारिता दुकानदारी हो गई है। एक तरफ वह पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहता है। पर खेद इस बात का है कि उसे इस स्तंभ का ध्यान उस समय आता है जब वह खुद व्यक्तिगत तौर पर संकट में होता है। नहीं तो वह पब्लिक सर्विस मैन(सार्वजनिक नौकर)बनने के लिए सदैव लालायित रहता है। वह उन्हीं की तरह सुविधाएं पाने के लिए सदैव हाथ पांव मारता रहता है। पर पत्रकार को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि समाज के लिए जीता है। ऐसे में वह जो मांग करें वह एक सीमा में हो। उसे रियायती दरों पर मकान, परिवहन तथा चिकित्सा के सुविधाएं मिल जाए तो इस गरीब देश के हिसाब से पर्याप्त होगा।यदि वह सुविधाओं तथा पैसों की लालच में आकर अपने पेशे से समझौता कर लेता है तो उसकी स्थिति तवायफों से भी बदतर होती है। सआदत हसन मंटो ने कहा कि कोठे की तवायफ और एक विका हुआ पत्रकार दोनों एक ही श्रेणी में आते हैं पर उसमें तवायफ की ज्यादा इज्जत होती है।
हिंदी पत्रकारिता में यदि हम प्रेमचंद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा प्रताप नारायण मिश्र आदि के जीवन तथा रहन-सहन को देखें तो वह निहायत ही सामान्य था। वे खुद वह सामान्य जीवन यापन करते थे जिसका पत्रकारिता में चित्रण करते थे । जिस अभाव तथा ऋणग्रस्तता का वर्णन इन पत्रकारों की लेखनी में मिलता है, वह कहीं न कहीं उनके जीवन से भी ताल्लुक रखता है। पत्रकारिता उनके लिए मुनाफा का जरिया न होकर एक मिशन था। पर आज के कुछ प्रतिष्ठित पत्रकार पूंजीपतियों जैसा जीवन जी रहे हैं। जमीन पर उनके पांव मुश्किल से ही पढ़ते हैं। हुए तो हवाई यात्राओं तथा पांच सितारा होटलों के आदी हो गए। इस विलासितापूर्ण जीवन शैली की उन्हें भारी कीमत चुकानी होती है। जो वर्ग उन्हें सुविधा उपलब्ध करा रहा है आखिर में वे उनके खिलाफ कैसे हो सकते हैं? अंततः वे उन्हीं के हितों में काम करने लगते हैं और अपनी जड़ों से कट जाते हैं। खलील जिब्रान ने सही कहा है-
तुम जुर्म के खिलाफ
कैसे नारा लगाओगे?
तुम्हारे मुंह में तो निवाला है।
पत्रकार की बिडंबना यह है कि वह दोहरी जिंदगी जीता है। एक तरफ वह पत्रकारिता में आदर्श,त्याग तथा सादगी की बड़ी-बड़ी बातें करता है। तो दूसरी तरफ खुद भोग विलास के दलदल में डूबा रहता है। वह दूसरों के व्यभिचार के किस्से को सामने लाता है तथा खुद पर्दे के पीछे उसी में लिप्त रहता है। विभिन्न विभागों की भ्रष्टाचार की नई-नई इबारत निरंतर लिखते रहते हैं। किस विभाग में किस काम के लिए कितनी बोली लगती है? इन्हें सब मालूम होता है। पर वहीं पर दूसरी ओर मामूली पैसे में ये कैसे अपने ईमान, नैतिकता तथा आदर्श को बेंच देते हैं? इसका जिक्र भी नहीं करते हैं। किसी ने सच ही लिखा है-
वह बंद कराने आए थे तवायफों के कोठे।
मगर सिक्कों की खनक देखकर खुद ही मुजरा कर बैठे।।
महंगाई का मुद्दा आज देश दुनिया में निरंतर छाया हुआ है।
विभिन्न वस्तुओं के दाम पत्रकारों की निगाह में आसमान छूने लगते हैं। लेकिन पत्र पत्रिकाओं के मूल्यों तथा विज्ञापनों की सौदेबाजी की ओर वह नजर नहीं डालते हैं। देश दुनिया की समस्याओं पर इनका बड़ा ही गहरा तथा व्यापक नजरिया होता है। उसके एक-एक रेशे को निचोड़ने में ये संकोच नहीं करते हैं। वहीं पर दूसरी ओर पत्रकारों के जो संगठन है उसमें आमतौर पर यह देखा जाता है कि ये केवल अपने वर्गीय हितों तथा लाभों पर ही ध्यान केंद्रित करते रहते हैं। किसी भी राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर की समस्याओं के विषय में भागीदारी नहीं निभाते हैं। आपको बताते चलू कि मैं खुद एक संगठन से जुड़ा हुआ हूं। उस संगठन ने मतदाता दिवस के अवसर पर रैली निकाल कर मतदाताओं को जागरूक करने का कार्य किया। ऐसे किसी समस्या या विषय पर पत्रकार संगठन आवाज नहीं उठाते हैं, सिर्फ आर्थिक हितों के अलावा। एक कवि ने लिखा है-
आओ अपने अंतर को झांके।
बहुत नाप चुके औरों को, अब अपने को नापे।।
पत्रकारिता जगत में अहं तथा एक दूसरे से ईर्ष्या-द्वेष इतना ज्यादा है जो अन्य कहीं बहुत कम देखने को मिलता है। एक ही दफ्तर में कार्य करने वाले पत्रकार एक दूसरे को फूटी आंखों नहीं सुहाते हैं । पुराने पत्रकारों में जो आत्मीयता थी वह इनमें नदारद है। इसका कारण यह है कि पत्रकारिता अब लोक मंगल तथा सत्य अन्वेषण का साधन न होकर पद,पैसा तथा प्रतिष्ठा कमाने का साधन बन गया है। उनमें मूल्यों की उत्कृष्टता को लेकर कोई लड़ाई नहीं होती है। बल्कि किस प्रकार बिना पढ़े लिखे तिकड़म भिड़ाकर एक दूसरे से आगे बढ़ जाए? इसकी होड़ लगी रहती है। ऐसे पत्रकार समाज के लिए पत्रकारिता कम करके अपने यश तथा श्रीवृद्धि में लग जाते हैं। समाज हित के बजाय व्यक्तिगत हित हावी हो जाता है। पत्रकार एक दूसरे के प्रति सहयोगात्मक भावना से कार्य न करके प्रतिस्पर्धी भाव से करते हैं। खुद किसी बड़ी लकीर खींचते के बजाए छोटी लकीर मिटा कर आगे बढ़ाने के कोशिश में रहते हैं। निदा फ़ाज़ली नहीं लिखा है कि-
यहां कौन कहां किसी को रास्ता देता है?
तुम मुझे गिरा कर यदि संभल सको तो चलो।।
जिस प्रकार विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं में अपने दल के प्रति निष्ठा तथा लगाव का अभाव होता है। कुछ वैसे ही दशा पत्रकारों की भी है। उड़ान भरने के लिए उनके पंख निरंतर फड़फड़ाते रहते हैं। किसी एक जगह के दाना पानी से उन्हें संतुष्टि नहीं मिलती है। वे निरंतर अखबार तथा चैनल बदलते रहते हैं। उनका अपना कोई व्यक्तित्व तो नहीं होता है। ऐसे में वह एक मशीनी पार्ट की तरह कहीं भी फिट बैठ जाते हैं।
पत्रकारों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए की सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता है। अपने कार्यों के प्रति निष्ठा, आत्मनिरीक्षण,आत्मलोचन तथा निरंतर संघर्ष पथ पर चलने की तमन्ना उन्हें ऊंचाइयों पर ले जा सकती है। लाख आंधी तूफान आए उसे घबराना नहीं होगा। साहिर लुधियानवी ने लिखा है कि-
हजार बर्क गिरे लाख आंधियां उठे।
वो वह फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं।
नीरज कुमार वर्मा नीरप्रिय
किसान सर्वोदय इंटर कालेज रायठ बस्ती (उ.प्र.)
मो.8400088017