🐃 *ओ३म्* 🐃
🪷 ईश्वरीय वाणी वेद 🪷
* ओ३म् इन्द्रायाहि धियेषितो विप्रजूत: सुतावत: । उप ब्रह्माणि वाघत: ।।
।। ऋग्वेद १/३/५।।
🌹 *मंत्र का पदार्थ*🌹
( इन्द्र ) हे परमेश्वर! ( दिया ) निरंतर ज्ञान युक्त बुद्धि का उत्तम कर्म से ( इषित: ) प्राप्त होने और ( विप्रजुत: ) बुद्धिमान विद्वान लोगों के जानने योग्य आप ( ब्रह्माणि ) ब्राह्मण अर्थात् जिन्होंने वेदों का अर्थ और ( सुतावत: ) विद्या के पदार्थ जाने हों,तथा ( वाघत: ) जो यज्ञ विद्या के अनुष्ठान से सुख उत्पन्न करने वाले हों,इन सबों की कृपा से ( उपायाहि ) प्राप्त हूजिए।
🌴 *मंत्र का भावार्थ*🌴
सब मनुष्यों को उचित है कि जो सब कार्य जगत की उत्पत्ति करने से आदि कारण ईश्वर है उसको शुद्ध बुद्धि विज्ञान से साक्षात् करना चाहिए।
📓 *मंत्र का सार तत्व*📓
हमारे सामने जो *सृष्टि, जगत्, संसार* है इसके दो रुपए है।एक *कार्य जगत* दूसरा *कारण जगत्*। कारण जगत् तो प्रकृति है जो अनादि तत्व है।कार्य जगत विकृति है। विकृति के दो अर्थ हैं।पहला अर्थ है *विकार* और दूसरा अर्थ है *विशेष कृति* दोनों अर्थ सम-सामयिक हैं।अब यहां ये विचार करना है जो *प्रकृति* है वो अनादि है। पहले से है।उसे किसी ने नहीं बनाया है मगर ये प्रकृति *जड़* है अर्थात स्वयं न बन सकती।न बिगड़ सकती।न ही रुपांतरित हो सकती है।इस *जड़ प्रकृति* से परमात्मा ने *विकृति विकार या विशेष कृति, सृष्टि,जगत, संसार* को बनाया इसलिए उसको *आदि कारण* बताया है।
ऐसे आदि कारण परमात्मा को आप मन माने तरीके,मन चाही पूजा पाठ से नहीं प्राप्त कर सकते! जैसा कि वर्तमान में लोग मनमानी *पूजा पाठ उपासना* कर रहे हैं और अपने *मिया मिट्ठू* बनकर खुश भी हो रहें कि हमने तो पूजा कर ली।अपनि पूजा को सही बताने के लिए प्रमाण भी देते हैं।
*जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरत देखी तिन तैसी*।
अब आप जरा परमात्मा की वाणी *वेद* में देखें कि वहां ईश्वर क्या कह रहे हैं।
ईश्वर आदेश देकर कहा रहा है वेद मंत्रों द्वारा कि जब तक *शुद्ध ज्ञान -शुद्ध कर्म और शुद्ध उपासना* नहीं होगी तब तक ईश्वर का साक्षात्कार असंभव है।
आचार्य सुरेश जोशी
*वैदिक प्रवक्ता*