🩸 *ओ३म्* 🩸
🥝 ईश्वरीय वाणी वेद 🥝
*ओ३म् दस्त्रा युवाकव: सुता नासत्या वृक्तबर्हिष: ।आ यातं रुद्रवर्तनी* ।
।। ऋग्वेद १/३/३ ।।
🌴 *मंत्र का पदार्थ*🌴
हे ( युवाकव: ) एक दूसरी से मिली वा पृथक क्रियाओं को सिद्ध करने ( सुता: ) पदार्थ विद्या के साथ को सिद्ध करके प्रकट करने ( वृक्तबर्हिष: ) उसके फल को दिखलाने वाले विद्वान लोगो! ( रुद्रवर्तनी ) जिनका प्राणमार्ग है,वे ( दस्त्रा ) दुःखों के नाश करने वाले ( नासत्या ) जिनमें एक भी गुण मिथ्या नहीं ( आयातम् ) जो अनेक प्रकार के व्यवहारों को प्राप्त कराने वाले हैं, उन पूर्वोक्त अश्वियों को जब विद्या से उपकार में ले आओगे उस समय तुम उत्तम सुखों को प्राप्त होओ।
🏵️ *मंत्र का भावार्थ* 🏵️
परमेश्वर मनुष्यों को उपदेश करता है कि हे मनुष्य लोगो! तुम सब सुखों की सिद्धि से दुःखों के विनाश के लिए शिल्पविद्या में अग्नि और जल का यथावत् उपयोग करना चाहिए!
☎️ *मंत्र का सार तत्व*☎️
साधारण मानव अग्नि को भोजन आदि व जल को स्नान आदि में प्रयोग करके उसका निम्न लाभ लेते हैं। ये लोग अतिभोग वादी होकर बार -बार जन्म मृत्यु के चक्कर में पड़ते हैं।
मध्यम वैज्ञानिक लोग जल -अग्नि का प्रयोग करके मानव को प्रकृति ज्ञान में समेट लेते हैं। वैज्ञानिक चमत्कारों के प्रयोग में मानव प्रकृतिवादी बनकर केवल प्रकृति का दोहन करते हैं और आज का *ग्लोबल वार्मिंग* इसी आधुनिक विज्ञान की देन है।
तीसरे जो वैदिक ऋषि हुए उन्होंने *अग्नि -जल* का यथायोग्य व्यवहार करके *अग्निहोत्र विज्ञान* की प्रतिस्थापन करके 🌻 पंचमहायज्ञ 🌻 यज्ञ द्वारा मानव मात्र के लिए *सम्यक भोग और योग* का मार्ग प्रशस्त कर सबको *सुख -शांति-आनंद* के प्रवेश द्वार तक पहुंचाने के लिए शिल्पविद्या का सही -सही उपयोग किया।
आचार्य सुरेश जोशी
🌳 *वैदिक प्रवक्ता*🌳