🌹 ओ३म् 🌹
🌻 ईश्वरीय वाणी वेद 🌻
ओ३म् अग्निना रयिमश्नवत् पोषमेव दिवेदिवे।यशसं वीरवत्तमम्।।
ऋग्वेद १/१/३
*मंत्र का पदार्थ* यह मनुष्य [अग्निना एव] अच्छी प्रकार ईश्वर की उपासना और भौतिक अग्नि ही को कलाओं में संयुक्त करने से [ दिवे दिवे ] प्रतिदिन [ पोषम् ]आत्मा और शरीर की पुष्टि करने वाला [ यशसम् ]जो उत्तम कीर्ति का बढ़ाने वाला और [ वीरवत्तमम् ] जिसको अच्छे-अच्छे विद्वान् वा शूरवीर लोग चाहा करते हैं [ रयिम् ] विद्या और सुवर्णादि उत्तम उस धन को सुगमता से [अश्नवत्] प्राप्त होता है।
*🌹मंत्र का भावार्थ*🌹
ईश्वर की आज्ञा में रहने तथा शिल्पविद्या संबंधित कार्यों की सिद्धि के लिए भौतिक अग्नि को सिद्ध करने वाले मनुष्यों को अक्षय अर्थात् जिसका कभी नाश नहीं होता,सो धन प्राप्त होता है,तथा मनुष्य लोग जिस धन से कीर्ति की वृद्धि और जिस धन को पाके वीर पुरुषों से युक्त होकर नाना सुखों से युक्त होते हैं।सबको उचित है कि इस धन को अवश्य प्राप्त करें।
🌻 *मंत्र का सार* 🌻
इस मंत्र में श्लेषा अलंकार होने से दो अर्थ हैं। प्रथम ईश्वर की आज्ञा पालन व अग्निहोत्र का प्रतिदिन प्राप्त करना। द्वितीय मानव मात्र को धन पाकर यश व वीरता को वरण करते हुए ईश्वर का धन्यवाद प्राप्त करना।
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