🌹🌹 ओ३म् 🌹🌹
*ईश्वरीय वाणी वेद*
ओ३म् अग्निमीऴे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।होतारं रत्नधातमम्।।
ऋग्वेद १/१/१
*यज्ञस्य*= हम लोग विद्वानों के सत्कार,संगम,महिमा और कर्म के *होतारम्*= देने तथा ग्रहण करने वाले *पुरोहितम्*=उत्पत्ति के समय से पहले परमाणु आदि सृष्टि के धारण करने और *ऋत्विजम्*= बारंबार उत्पत्ति के समय में स्थूल सृष्टि के रचने वाले ऋतु-ऋतु में उपासना करने योग्य *रत्नधातमम्*= और निश्चय करके मनोहर पृथिवी वा सुवर्ण आदि रत्नों के धारण करने वा *देवम्*= देने तथा सब पदार्थों के प्रकाश करने वाले परमेश्वर की *ईळे*= स्तुति करते हैं
अर्थात् पहले से जगत् को धारण करने वाले,यज्ञ के प्रकाशक प्रत्येक ऋतु में पूजनीय, सुंदर पदार्थो को देने वाले, रमणीय रत्नादिकों का पोषण करने वाले ज्ञानमय प्रभू की मैं उपासक स्तुति करता हूं।