चाह जहां होती वहाँ, मिल जाती है राह

चाह जहां होती वहाँ, मिल जाती है राह।

पथ साधक की साधना, उसे दिलाती वाह।।

आप सभी करते रहें,अपना अपना कर्म।

नहीं और कोई बड़ा, मानव का निज धर्म।।

नहीं दया की चाह है, नहीं  राजसी  ठाट।

धन दौलत चाहूं नहीं, नहीं महल की खाट।।

दर्शन पाऊं नित्य मैं, रोज मिले वरदान।

पूरे सारे काज हों, बिना किसी व्यवधान।।

समय कहां है आजकल, व्यस्त बहुत सब लोग।

कभी  कभी  ही  मिल रहे, ऐसा क्यों   संयोग।।

मात पिता के चरण में, होता है सुखधाम।

ले पाते हम सुख नहीं, आड़  बहाने  काम।।

जब तक होता है पिता, होते हम बेफिक्र।

आंख मूंद लेते पिता, करें रोज ही जिक्र।।

नमन चरण में कर रहा, नित्य सुबह औ शाम।

उसके पूरे हो रहे, बिन  बाधा  सब  काम।।

मजदूरी वो कर रहा, करता  नहीं  गुनाह।

जीवन चलता यूं रहें, नहीं अधिक की चाह।।

 

सुधीर श्रीवास्तव

गोण्डा उत्तर प्रदेश

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