शब्द माला में तुमको पिरोती रही

शब्द माला में तुमको पिरोती रही 

तुम को पाती रही खुद को खोती रही//1

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ख्वाब मैं चैन मेरा गया लूटकर 

तन्हां खामोश घुट घुट के रोती रही//2

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रात गमगीन मेरी तो जब से हुई

गम की बारिश यूं घर को भिगोती रही //3

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दिल किसी से न‌ अपना लगाऊंगी अब

रात यह सोचकर मैं तो रोती रही//4

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ज से जा बेवफा माफ तुझको किया

त से सबका तमाशा मैं होती रही //5

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मूक होती जुबां बोलते भाव मैं 

मन ही मन यूॅं ही सबको सजोती रही //6

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शब्द तेरे लिए फूल से थे चुने

अपने हिस्से मे कांटे चुभोती रही //7

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थी यही आरजू महके मेरा चमन

याद में तेरी पतझर मैं होती रही //8

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गैर को लोग अपना बनाते हैं अब

मैं तो अपनो में ही गैर होती रही //9

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शब्द कानों में घुलते हैं मिश्री से जो

ऐसे मोती सरीता पिरोती रही //10

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