प्रियवर बोलो कब आओगे…..पतझड़-सा सूने जीवन में ,,, कब आकर पुष्प खिलाओगे।
सांझ हुई है इस जीवन की, बोलो प्रियवर कब आओगे. तन्हा तन्हा कटते हैं दिन,करवट लेकर कटतीं रातें
मुझे जलाती हैं अब निशदिन, रिमझिम-रिमझिम ये बरसातें।
बीत रहा यह सावन भी अब ..कब मन की प्यास बुझाओगे।
साँझ हुई है इस जीवन की, बोलो प्रियवर कब आवोगे ।
तुझे बुलाती हैं बेकल हो… तकिए चादर की ये सिकुड़न।
मंद हवा की आहट से भी ,बढ़ जाती है दिल की धड़कन।
सूनी है मन की देहरी यह … कब आकर दीप जलाओगे।।
सांझ हुई है इस जीवन की, बोलो प्रियवर कब आओगे।
चांदनी रातों की शबनम मुझको अब रास नहीं आती।
चूड़ी बिंदिया ,गजरा लाली , पैजनिया मुझे नहीं भाती ।
तेरी राह निहारे अँखियाँ, कब तक इनको हरसाओगे ।
सांझ हुई है इस जीवन की , बोलो प्रियवर कब आवोगे ।। (सरिता सिंह गोरखपुर)