मेरे दिल की हर धड़कन में बस मां का प्यार है, राम जी कन्नौजिया,,

अनुराग लक्ष्य,24 अप्रैल
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,
मुम्बई संवाददाता ।
मुंबई की सरजमीन साहित्य और अदब के लिए हमेशा जानी और पहचानी जाती रही है, और एक से एक शायर, अदीब, फनकार और गीतकार इस सर ज़मीं पर अपनी काबिलियत से जाने और पहचाने जा रहे हैं। इसी क्रम में एक ऐसा रचना कर जो अपनी उत्कीरिष्ट रचनाओं और गीतों की वजह से मुंबई में अपना खास मुकाम हासिल कर चुके हैं। दुनिया ए अदब जिन्हें राम जी कन्नौजिया के नाम से जानती और पहचानती है। अनुराग लक्ष्य के माध्यम से आज हम ऐसे ही रचनाकार राम जी कन्नौजिया की गजलों और गीतों से रूबरू हो रहे हैं इन रचनाओं के साथ,,,
(1)”जिन्दगी, जी रहे हैं जो भी, गम के साये में,
पूछिये उनसे, कि जीवन की हकीकत क्या है,
जो सारी उम्र, तरसते रहे ममता के लिए,
उनके दिल से पूछो, माँ कि मोहब्बत क्या है,
(2)”मेरे दिल की हर धड़कन में, बसा माँ का प्यार है,
माँ के कदमों तले, जन्नत है मेरा संसार है,
अपनी हर साँस में, खुशबू तेरी मॅहसूस करता हूँ,
मेरे लहू का हर कतरा माँ,तेरा कर्जदार है,
(3)”सोचता हूँ, कैसे बचपन के दिन रहे होंगे,
ना जानें माँ ने, कैसे कैसे दुख सहे होंगे,
माँ दिल के अरमानों को, सपनों से सजाई होगी,
खुद भूखी रह करके, हमें दूध पीलाई होगी,
कभी जरा सी मुसीबत ने भी,जो की हलचल,
माँ ने दिन रात तो, रो रोके बिताई होगी,
सिर्फ एहसास कर,आँखे छलकती,दिल भी भर आता,
अपने से अलग कर माँ को, बेटा क्युँ ना पछताता,
चाहे लो जनम फिर से, लुटादो दुनियाँ की दौलत,
दुबारा माँ नहीं मिलती, ना बचपन लौटकर आता,,
दोस्तों- माँ जिन्दगी का हसीन तोहफा,
कुदरत की अनमोल धरोहर है,
माँ के आगे, पूरी कायनात का वजन कुछ भी नहीं,
अरे माँ के बगैर तो, श्रृष्टी की कल्पना भी अधूरी है,
“उसकी तहरीर, चूँम लेता हूँ,
उसकी तदबीर, चूँम लेता हूँ,
दर्द जब हद से,गुजरता है कभी
माँ कि तस्वीर ,चूँम लेता हूँ,
साथियों- माँ कि, एक खूबसूरत नज्म आज मैं आप सबके हवाले कर रहा हूँ,
यह नज्म उन हरेक शक्स को समर्पित है,जो अपनी माँ से, बेईम्तहाँ मोहब्बत करते हैं,
नज्म का उन्मान है- कभी भूले से दिल ना माँ का दुखाना यारों,
( नज्म)
कभी भूले से, दिल ना माँ का दुखाना यारों,
नहीं बह जायेगा, अश्कों में जमाना यारों,
(1)-माँ कि महिमाँ का ,इस धरा पे कोई तोल नहीं,
माँ कि ममता बड़ी अनमोल, कोई मोल नहीं,
कौन सुख चैन, भला खोता है किसी के लिए,
फकत एक माँ है, जो मरती तेरी खुशी के लिए,
आज खुशहाल, जो गुलशन तेरा बगीचा है,
दोस्त, माँ ने इसे ,अपने लहू से सीचा है,
कभी भूले से, दिल ना माँ का दुखाना यारों,
नहीं बह जायेगा, अश्कों में जमाना यारों,
(2)-कभी रोया तो, माँ तुझसे लिपट के रोई थी,
माँ हिफाजत में तेरी, रातभर ना सोई थी,
गिले बिस्तर पे माँ खुद सोई, हटाकर तुझको,
सुलाई रातभर, सीने से लगाकर तुझको,
लोरियाँ गाके सुनाई,कि तुँ खुशहाल रहे,
चाँद के जैसा ही, आँचल में मेरा लाल रहे,
कभी भूले से,दिल ना माँ का दुखाना यारों,
नहीं बह जायेगा,अश्कों में जमाना यारों,
(3)-कभी तनहाई में, जब माँ कि याद आती है,
आँख भर भरके, आँसुओं से छलक जाती है,
था बदनसीब, मेरा रब भी मुझसे रुठ गया,
हुइ रुखसत जहाँ से, माँ का साथ छूट गया,
ना दिल को खौफ है, दुनियाँ के इन खुदाओं का,
है सर पे जब तक, माँ के असर दुआओं का,
कभी भूले से, दिल ना माँ का दुखाना यारों,
नहीं बह जायेगा, अश्कों में जमाना यारों,
(4)-किसी सूरत में भी, ममता की डोर मत तोडो़,
निकाल घर से, माँ को आश्रम में मत छोडो़,
श्रृष्टी की कल्पना भी, माँ के बिन अधूरी है,
माँ के कदमों में झुकी, कायनात पूरी है,
दुबारा जन्म भी लेकर, जहां में आओगे
दूध के कर्ज को, फिर भी चुका ना पाओगे,,
,,,,,पेशकश,, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *