स्वाभिमान

स्वाभिमान मानव का, आभूषण है मान।

निज उर में रखना सदा,मानव इसका ध्यान।।

स्वाभिमान से ही मिले,निज गौरव सम्मान।

मानव तन अनमोल है, श्रेयस्कर जो तु जान।।

धन दौलत बेकार है, करें नीच जो काम।

मरकर भी मुक्ति नहीं, अपयश मिले इनाम।।

स्वाभिमान से जो जिया,सुख का भागीदार।

घास की रोटी खाकर भी, राणा बने महान।।

देशभक्ति से बड़ा नहीं, जग में कोई काम।

मातृभूमि के लिए तुम्हें, करना जान कुर्बान।।

मातृभाषा अभिमान हो,निज भाषा सम्मान।

प्रशस्त उन्नति के मार्ग हैं,रखना इसका ध्यान।।

स्वाभिमान अभिमान में, बहुत महीन लकीर।

स्वाभिमान से ही रहे, राजा और फकीर।।

स्वरचित एवं मौलिक रचना

    डॉ अनुराधा प्रियदर्शिनी

    प्रयागराज उत्तर प्रदेश

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