त्रिभंगी छंद

रघुवर

हे मेरे रघुवर,गुण के सागर,मुझ दासी को,अपनाओ।

यह मन है हारा,बनो सहारा,सहज कृपा रस,बरसाओ।।

जग ने तो छोड़ा,नाता तोड़ा,चरण शरण में,आज खड़ी।

मैं शरण तुम्हारी,सायकधारी,हरण कीजिए, विपत पड़ी।

हे दशरथ नंदन, करती वंदन,विपदा छाई, कृपा करो।

हे रघुकुल नंदन,भव भय भंजन,आकुल मन में,नेह भरो।।

हे मेरे स्वामी,अंतर्यामी,राम दयामय,कष्ट हरो।

तुम जग के दाता,दुख से त्राता,तमस मिटाकर,ज्ञान भरो।।

हे असुर निकंदन,रघुकुल नंदन,त्रिविध तापभय,हारी हो।।

प्रभु मुनि मन रंजन,पर दुख भंजन,मर्यादा के,धारी हो।।

हे प्रभु प्रतिपालक,जग संचालक,कृपा सिंधु दुख दूर करो।

हे मंगलकारी,संकट हारी,राम कृपा भरपूर करो।

अंजना सिन्हा “सखी “
रायगढ़

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