रोज़ ही रोज़ नया एक अज़ूबा देखूं।-रूपेंद्र नाथ सिंह रूप

नींद से ढकने लगीं अब तो ये आंखें मेरी।
भूलने वाले मैं कबतक तेरा रस्ता देखूं।

दोस्तो रोज़ ही दुनिया का तमाशा देखूं।
रोज़ ही रोज़ नया एक अज़ूबा देखूं।

क्या बताऊं कि ज़माने में, ये क्या क्या देखूं।
इसको रोता तो कभी उसको मैं हंसता देखूं।

लोग कहते हैं कि पागल है सरासर यह तो।
जागती आंख से जब कोई भी सपना देखूं।

या ख़ुदा मुझको बसारत वो इनायत कर दे।
जो भी जैसा है उसे आंख से वैसा देखूं।

मुब्तिला दर्द में सब लोग यहां दिखते हैं।
दर्द अपना ही कि मैं दर्द पराया देखूं।

यूं लगे चांद ही दरिया में उतर आया है।
चांदनी रात में जब उनको नहाता देखूं।

अब की बरसात में घर लील लिया दरिया ने।
रूप आ चल कि कहीं चल के ठिकाना देखूं।

रूपेंद्र नाथ सिंह रूप

 

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