तुझे बेवफ़ा कहूं या बहरूपिया कहूं, तू ही बता ऐ संग ए दिल तुझको मैं क्या कहूं , सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,

अनुराग लक्ष्य, 14 मार्च
मुम्बई संवाददाता ।
ज़िंदगी जब दौड़ती है तो रगों में बहने वाला खून भी दौड़ता है और इस दौड़ में शामिल हो कर इंसान कभी कभी अपनी मंज़िल तो पा लेता है, लेकिन कभी कभी ऐसा भी होता है कि थक हार कर अधूरे रास्ते से लौट आता है। और यही शिकस्त उसे ज़िंदगी भर जीने नहीं देती। फिर मैदान चाहे इश्क ओ मुहब्बत का हो या रणभूमि, शिकस्त तो शिकस्त ही कहलाती है। ज़िंदगी के इसी ताने बाने पर आज सुधि पाठको के लिए मेरे कुछ चुनिंदा कतात और मुक्तक ।

1/ ज़िंदगी बेनूर होकर रह गई
प्यार का दस्तूर हो गई
जिसको समझा मैने मंदिर का दिया
बेवफा मगरूर होकर रह गई ।

2/ ज़िंदगी में कभी जब गम का धुआं होता है
ज़िंदगी है ही नहीं ऐसा गुमां होता है
दर्द ही जिनका मुकद्दर है वोह यह कहते हैं
दर्द में दर्द का एहसास कहां होता है ।

3/ तुझे बेवफा कहूं या बहरूपिया कहूं
तू ही बता ऐ संग ए दिल तुझको मैं क्या कहूं
तू चांदनी थी मेरी अंधेरों में को गई
तुझे मैं हया का नाम दूं या बेहया कहूं ।

4/ मुहब्बत की नुमाइश इस तरह अच्छी नहीं साहब
सर ए बाज़ार ख्वाहिश इस तरह अच्छी नहीं साहब
किसी के दिल में रहना, फिर उसी दिल से निकल जाना
यहां ऐसी रिहाइश इस तरह अच्छी नहीं साहब ।

,,,,,,, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,,,,
,,,,,,,,लिरिक्स राइटर, मुंबई,,,,,,,,,

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