धर्म-शास्त्रों के अध्ययन के बिना परमात्मा को समझ पाना असम्भव – स्वामी श्री राघवाचार्य जी महाराज

 

महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या धाम l परम पूज्य गुरुदेव अनन्तश्री विभूषित महामण्डलेश्वर स्वामी श्री प्रखर जी महाराज के पावन सानिध्य एवं श्रीमज्जगद्गुरु रामानुजाचार्य डॉ० स्वामी श्री राघवाचार्य जी महाराज के संयोजकत्व में विगत 22 फरवरी से सरयू तट, गोला घाट पर आयोजित किए जा रहे श्री लक्षचण्डी महायज्ञ, श्री लक्षगणपति महायज्ञ एवं श्रीराम यज्ञ में प्रातः से लेकर रात्रि तक, नित्य माता भगवती की आराधना एवं ज्ञान गंगा प्रवाहित की जा रही है। 1700 कर्मनिष्ठ विद्वान ब्राह्मण, श्री प्रखर परोपकार मिशन संस्कृत एकेडमी के डॉयरेक्टर डॉ० सज्जन प्रसाद तिवारी जी की देख-रेख में एक साथ बैठकर दुर्गा सप्तशती एवं गणपत्यथर्व शीर्ष पाठों का वाचन प्रतिदिन कर रहे हैं, वहीं महायज्ञ की 100 कुण्डीय विराट यज्ञशाला में देश-विदेश से सम्मिलित यजमानगण, यज्ञाचार्य वेदमूर्ति पं० लक्ष्मीकान्त दीक्षित जी आचार्यत्व में पूजन एवं हवन कार्यों का प्रतिपादन नित्य कर रहे हैं। यज्ञस्थल पर ही निर्मित दो अन्य यज्ञशाला में नियुक्त अग्निहोत्र वैदिकों के द्वारा श्रौत यज्ञ के अन्तर्गत मित्रविन्दा इष्टि एवं चातुर्मास्य इष्टि यज्ञ को किया जा रहा है। मित्रविन्ध इष्टि यज्ञ करने से राष्ट्र की सम्पूर्ण समृद्धि, सम्पूर्ण विश्व में मैत्री, राष्ट्र के प्रत्येक प्राणी का उत्तम स्वास्थ्य तथा विश्व कल्याण की भावना जागृत होती है। इसमें पुरोडास चारु जैसे 10 प्रसाद शामिल हैं, जो 10 देवताओं के लिए किया जाता है, इस इष्टी के दक्षिण में 10 गायें या 1000 गायें होती हैं। इसी प्रकार विभिन्न कामनाओं से भगवान नारायण की प्रसन्नता के लिए वैदिक विधि से विभिन्न अग्नियष्टि एवं अन्य यज्ञ किये जाते हैं। चातुर्मास्य इष्टि एक महान यज्ञ है, अहिताग्नि ब्राह्मण द्वारा किया जाने वाला एक वैदिक दैनिक अनुष्ठान है। यह अक्षय है. चातुर्मास्य यज्ञ में चार त्यौहार हैं, वैश्वदेव महोत्सव, वरुण प्रधान महोत्सव, सकमेध महोत्सव और शुनसिरिया महोत्सव (राष्ट्र की उन्नति के लिए)। चातुर्मास्य यज्ञ भगवान नारायण का साक्षात स्वरूप है। इसका वर्णन वेदों में मिलता है। वेदों में वर्णन है कि चातुर्मास्य यजी का पुनरावर्तन नहीं होता तथा चातुर्मास्य में सहायता करने वाले की सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं तथा इस महायज्ञ का दर्शन भी सर्वोत्तम माना जाता है।
महायज्ञ के ज्ञान मण्डपम् में प्रातः सन्त सम्मेलन, तदुपरान्त डॉ० स्वामी श्री राघवाचार्य जी महाराज के श्रीमुख से श्रीराम कथा एवं महायज्ञ के लीला मण्डपम् में दिन के समय श्रीराम लीला, रात्रि के समय श्रीकृष्ण लीला का अद्भुत मंचन श्रीराधा सर्वेश्वर रास मण्डली, वृन्दावन के उच्चकोटि के कलाकारों द्वारा प्रतिदिन किया जा रहा है। सायंकालीन माता सरयू जी की आरती भी नित्यप्रति की जा रही है।
आज सन्त सम्मेलन में उपस्थित वक्ताओं ने सदाचार पर अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए। सर्वप्रथम श्री प्रखर परोपकार मिशन ट्रस्ट की संयुक्त सचिव माता चिदानन्दमयी जी ने ‘आचार प्रभवो धर्मः’ के माध्यम से श्रद्धालु भक्तों को सम्बोधित करते हुए कहा कि आचार से ही धर्म की उत्पत्ति होती है, न कि धर्म से आचार की उत्पत्ति, इसलिए मनुष्य में सदाचार का गुण ही सर्वश्रेष्ठ गुण है। उन्होंने पूज्य महाराजश्री द्वारा किए जा रहे श्रीलक्षचण्डी महायज्ञ के माध्यम से समझाने का प्रयास किया कि इस महायज्ञ में दुर्गा सप्तशती एवं गणपत्यथर्वशीर्ष पाठों का वाचन एवं हवन, 1700 आचारवान् ब्राह्मणों के द्वारा ही किया जा रहा है, जिनको डॉ० सज्जन प्रसाद तिवारी जी के दिशा-निर्देशन में सदाचार एवं योग्यता के परीक्षण के उपरान्त ही चयनित किया गया है। पूज्य महाराजश्री, विद्वानों के चयन में सदैव सदाचार को महत्व देते हैं क्योंकि यदि महायज्ञ में सम्मिलित विद्वान सदाचारी एवं योग्य नहीं होगा तो यज्ञ का पुण्यफल कैसे प्राप्त होगा। माता जी ने कहा कि वर्तमान समय युवा पीढ़ी भ्रमित है क्योंकि वह हिन्दू, मुस्लिम, सिख एवं इसाई को ही धर्म मानती है, बल्कि यह सब पन्थ हैं। हमारा धर्म, सनातन धर्म है एवं हिन्दुस्तान में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिन्दू है। उन्होंने कहा कि धर्म-शास्त्रों के अध्ययन के बिना परमात्मा को समझ पाना असम्भव है, अतः धर्म-शास्त्रों का अध्ययन आज की युवा पीढ़ी के लिए नितान्त आवश्यक है।

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