अनुराग लक्ष्य, 21 दिसंबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,
मुम्बई संवाददाता ।
क्या क्या न यहां खेल दिखाती हैं रोटियां, रुसवा यहां सभी को कराती हैं रोटियां, जी हां साहब, रोटी की लड़ाई शायद दुनिया की सबसे अजीम तरीन लड़ाई है। इंसानी जिंदगी की जद्दोजहद में जितनी कश्मकश और यातनाएं इंसानों ने झेली हैं, शायद ही किसी और गोशे में दिखाई देती हों।
आज एक ऐसी दर्दनाक कहानी को बयां करती हुई धरावी ट्रांजिस कैंप की सैयदा की कहानी है, जिसने मर्दों के इस समाज में अपनी औरत होने का बखूबी एहसास करा रही है। शौहर के तलाक के बाद सैयदा ने जिस दिलेरी का परिचय दिया, उसे उसकी हिम्मत को सलाम।
धरावी के ट्रांजिस्ट कैंप में एक छोटी सी दुकान पर सुबह 7 बजे से 12 बजे तक रोटी और सब्ज़ी की दुकान लगाकर अपने परिवार और बच्चों का भरड पोषण कर रही है। मात्र 30 रुपए की छोटी सी कीमत पर सैयदा चार रोटियां और कई तरह की सब्जियां खिलाकर लोगों के दिलों में अपनी जगह बना चुकी हैं और साथ ही साथ अपने ग्राहकों से भरपूर सम्मान भी पा रही है।
अनुराग लक्ष्य मुंबई संवाददाता सलीम बस्तवी अज़ीज़ी ने जब सैयदा के बिगड़े हालात का जायेज़ा लिया तो सैयदा ने बड़े ही संजीदगी से अपनी बात रखते हुए कहा कि जब वक्त ने मुझसे बेवफाई कर ही दी है तो मैंने यही ठाना कि में तो उससे वफा ही करूंगी और दुनिया में यह साबित कर दूंगी कि वक्त और हालात की मारी औरत जब कुछ कर गुजरने पर आती है तो सब कुछ कर लेती है जो आज मर्द कर सकता है। मैं यह छोटा सा काम करके बहुत अच्छा महसूस कर रही हूं और खुश हूं।