युग प्रवर्तक स्वामी विवेकानंद

सनातन धर्म के उपासक व प्रचारक,

युग प्रवर्तक,महान भारत के संत।

 

जिनका बचपन का नाम था नरेंद्र,

जो बाद में कहलाए स्वामी विवेकानंद। 

 

12 जनवरी,सन् 1862 को कलकत्ता में हुआ अवतरण,

दिवस मकर संक्रांति का था धार्मिक पर्व।

 

इनके पिता विश्वनाथ दत्त थे,

माता भुवनेश्वरी के गोद में पले। 

 

बचपन से तीक्ष्ण व कुशाग्र बुद्धि,

ईश्वर की कृपा से थी इनमें सद्बुद्धि।

 

एक दिन दक्षिणेश्वर मंदिर की ओर चल पड़े,

वहां काली भक्त रामकृष्ण परमहंस से जाकर मिले।

 

सहसा उनको पाकर मन गदगद और प्रफुल्लित हुआ,

उनको ही आजीवन आध्यात्मिक गुरु मानकर उनसे दीक्षित हुए। 

 

कम उम्र में ही युवा संन्यासी बन गये,

अपने गुरु की आज्ञा पाकर गेरुआ वस्त्र तन पर धारण किया।

 

एक दिन विश्व धर्म सम्मेलन की उद्घोषणा हुई,

भारतवर्ष की ओर से वे वहां आमंत्रित हुए।

 

31 मई,सन् 1893 को बंबई से कोलम्बो के लिए जहाज़ से रवाना हुआ,

कोलंबो से सिंगापुर,हांगकांग,टोकियो से बैंकवर बंदरगाह पहुंचे।

 

फ़िर वहां रेलगाड़ी से शिकागो पहुंचे,

नये शहर में इनका पदार्पण हुआ।

 

अपने भाषणों में अमेरिका के भाईयों एवं बहनों से सर्वप्रथम अभिवादन किया,

यह सुनकर सारे महफ़िलों में तालियों से गूंज उठा।

 

शून्य विषय पर इन्होंने जोशीला भाषण दिया,

अपने प्राचीन भारत के वेद,वेदांत दर्शन से सबको परिचय करवाया।

 

कर्मयोग,भक्तियोग एवं राजयोग पर व्याख्यान दिया,

विश्व धर्म सम्मेलन शिकागो में इन्हें विवेकानंद की उपाधि मिली।

 

उठो,जागो और लक्ष्य की प्राप्ति करो,

यह नारा विश्व में मिसाल कायम हुआ।

 

4 जुलाई,सन् 1902 को कम उम्र में देह त्यागा,

अपने आश्रम के बच्चों को संस्कृत व्याकरण पढ़ाते-पढ़ाते रात्रि के 9 बजे इनका महानिर्वाण हुआ।

 

आज़ का दिवस संपूर्ण भारतवर्ष के लिए इनकी स्मृति है,

इनके चरणों में मेरा कोटि-कोटि नमन है।

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स्वरचित एवं मौलिक रचना

 

प्रकाश राय,समस्तीपुर,बिहार ✍️

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