स्पर्धा हो तो राष्ट्र के लिए, जयकिशन जैकी,,,,,,
अनुराग लक्ष्य, 15 जून
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
है भारत क्या जहाँ को फिर दिखाने की जरूरत है,
है ताकत क्या हमारी फिर बताने की जरूरत है ।
हुकूमत एक दिन होगी हमारी सारी दुनिया पर,
तिरंगे को इन हाथों में उठाने की जरूरत है ।।
मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी, आज अपने इस कलाम का सहारा लेकर एक ऐसे नौजवान का ज़िक्र करने जा रहा हूँ। दुनिया और समाज जिसे जयकिशन जैकी के नाम से जानती और पहचानती है।
गांधी नगर गल्ला मंडी स्थित एक किराने की छोटी सी दुकान से अपनी जीविका चलने वाले जयकिशन के सीने में राष्ट भक्ति कूट कूट कर भरी हुई है। तभी तो ऐसे गमगीन माहौल में भी वो अपने टूटे हाथों के प्लास्टर पर भी अपने देश भक्ति को नहीं भूले, और स्पर्धा हो तो राष्ट्र के लिए का नारा समाज के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।
उनके इस चरित्र और किरदार से तो यही साबित हो रहा है कि इंसान कितनी ही मुश्किल राहों से गुजरे, लेकिन उसे अपने देश प्रेम को कभी भूलना नहीं चाहिए।
जैकी बातों बातों में यह भी कहते हैं कि हम हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई हो सकते हैं लेकिन जब हम अपने आपको सबसे पहले भारतीय समझते हैं तो उसका मज़ा कुछ और होता है।
उनके इस जज्बे को सलाम, जो आर्थिक तंगी के बावजूद समाज को एक सच्चा भारतीय होने का संदेश दे रहे हैं।