ब्रह्मर्षि डॉ. मोहनजी को अमेरिका में विशेष सम्मान; सेवा और आध्यात्म के जरिए वैश्विक स्तर पर बढ़ाई देश की गरिमा
महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या/नई दिल्ली/न्यूयॉर्क
भारत की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत और सनातन संस्कृति का परचम एक बार फिर विश्व पटल पर लहराया है। अमेरिका के टेक्सास राज्य ने मानवता, समाजसेवा और आध्यात्मिक जागरूकता के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए 16 अप्रैल को आधिकारिक रूप से ‘मोहनजी डे’ और ‘मोहनजी फाउंडेशन डे’ घोषित किया है। यह सम्मान ब्रह्मर्षि डॉ. मोहनजी के उस निस्वार्थ सेवा भाव को समर्पित है, जिसने सरहदों से परे जाकर लाखों जीवन बदले हैं। अपराध मुक्त समाज की मिसाल डॉ. मोहनजी के कार्यों का प्रभाव केवल उपदेशों तक सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर भी ठोस परिणाम दिखा रहा है। दक्षिण अफ्रीका के नोनोती प्रांत में उनके मार्गदर्शन में चल रही निरंतर भोजन सेवा (Annadan) का परिणाम यह रहा कि वहां अपराध दर में 80% की कमी दर्ज की गई, जिसकी पुष्टि स्वयं स्थानीय पुलिस प्रशासन ने की है। उनका मूल मंत्र है प्रचार से ज्यादा परिणाम पर ध्यान दें। वैश्विक प्रभाव: 90 देशों में उपस्थिति डॉ. मोहनजी द्वारा स्थापित संस्थाएं आज विश्वभर में सेवा का पर्याय बन चुकी हैं:
31 देशों में चैरिटी गतिविधियाँ सक्रिय रूप से संचालित हैं।
ACT Foundation (लंदन) और Ammucare Charitable Trust (भारत) के माध्यम से वंचितों की सहायता। वर्ष 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 43 देशों में लगभग 8.62 लाख वीगन भोजन परोसे गए। स्कॉटलैंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और सर्बिया सहित 14 से अधिक देशों में आश्रमों की स्थापना। युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत नशे और अपराध की दलदल से युवाओं को बाहर निकाल कर उन्हें आध्यात्मिक मार्ग पर लाने में डॉ. मोहनजी की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। हाल ही में भारत भ्रमण के दौरान अयोध्या पहुंचे मोहनजी ने कहा कि “भारत की आत्मा राम में बसती है” और अयोध्या विश्व की सांस्कृतिक राजधानी बन रही है। वर्तमान में वे महाराष्ट्र के गणेशपुरी (तानसा नदी तट) पर एक भव्य आश्रम का विकास कर रहे हैं। एक विचारधारा को सम्मान 16 अप्रैल को ‘मोहनजी डे’ के रूप में मान्यता मिलना केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि उनकी उस विचारधारा की जीत है जो “Humankind to Kind Humans” (मानव जाति से दयालु मानव की ओर) का संदेश देती है। महाकुंभ में भागीदारी से लेकर वर्ल्ड ट्राइबल एलायंस के माध्यम से आदिवासियों की संस्कृति को संरक्षित करने तक, उनका हर कदम ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना को चरितार्थ करता है।