साहब तो अब हमारे अदाकार हो गये।

 

ग़ज़ल

होना था किसका,किसके वफ़ादार हो गये,
साहब तो अब हमारे अदाकार हो गये।

मग़रिब की वादियों के तफ़रदार हो गये,
लगता है आप ज़हन से बीमार हो गये।

कुछ राज़ फ़ाश करने की धमकी मिली है क्या,
जो आप कुछ भी करने को तैय्यार हो गये।

ठोकर पे जिनको रखते थे पहले के हुक़्मराँ,
वो आज कैसे इतने असरदार हो गये।

हो कर शहीद ज़िंदा है वो सबके दिलों में,
अहल-ए-अरब को देख लो मुर्दार हो गये।

यू.एन.ओ.मेम्बरान के लब तो खुले मगर,
ज़ालिम के रुख़ को देख ख़बरदार हो गये।

वो ख़ूँ बहा के आज भी महबूब है नदीम,
हम एहतेजाज करके गुनहगार हो गये।

नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥