अयोध्या में अवतरित उजास

काव्य: “अयोध्या में अवतरित उजास”

अंबर ने आज स्वयं दीप जलाए,

धरती ने अपने द्वार सजाए।

सरयू की लहरें गुनगुनाईं,

अयोध्या ने मंगल धुन गाई।

कौशल्या के आँगन में ज्योति उतरी,

मानो स्वयं प्रभात धरा पर उतरी।

नन्हे चरणों में ब्रह्म समाया,

हर कण में नव जीवन छाया।

शंख बिना ही गूँजा आलाप,

जग ने पहचाना दिव्य प्रताप।

पवन ने चंदन खुशबू बिखेरी,

हर दिशा बनी जैसे फुलवारी।

देवों ने नभ से फूल बरसाए,

ऋषियों ने मंत्रों के दीप जलाए।

दुख की छाया पल में खोई,

आनंद की गंगा हर मन में रोई।

वह जन्म नहीं, युग का संकल्प था,

अधर्म पर धर्म का प्रथम विकल्प था।

राम नहीं केवल नाम महान,

वे जीवन का सच्चा प्रमाण।

 

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव