काव्य: “मां कालरात्रि का दिव्य प्राकट्य”
अंधकार के गर्भ से ज्योति जब निकलती है,
मां कालरात्रि की छवि तब धरा पर पलती है।
केश बिखरे, नेत्र अग्नि से दहकते प्रचंड,
भय भी कांपे, देख रूप उनका अखंड।
गर्दभ पर सवार, कर में खड्ग विराजे,
असुरों के अभिमान को पल में ही सुलगाए।
वज्र समान स्वर, गगन में गूंज उठे,
पापों के पर्वत भी क्षण में धूल बन झुके।
रक्तिम आभा से दिशाएं हो जातीं लाल,
हर हृदय में जाग उठे अद्भुत सा कमाल।
भय नहीं, वरदान की वर्षा वो करती हैं,
अपने भक्तों की हर पीड़ा हरती हैं।
तम के भीतर छुपा जो सत्य दिखाती हैं,
अज्ञान के बंधन से मुक्त कराती हैं।
रौद्र रूप में भी ममता की धारा बहती,
हर विपदा में मां की कृपा साथ रहती।
सातवें दिवस की यह अद्भुत आराधना,
मां कालरात्रि में ही है सृष्टि की साधना।
जो झुका उनके चरणों में निष्कपट भाव से,
उसका जीवन भरता है दिव्य प्रकाश से।
राजलक्ष्मी श्रीवास्तव