विदेशी भूमि पर हिंदी का परचम लहराते बस्ती की माटी के लाल : डॉ मुकेश मिश्र
बस्ती जनपद के गांव बेलसुही में जन्मे डॉ. मुकेश कुमार मिश्र, हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार–प्रसार के ऐसे हस्ताक्षर हैं जो हम सब बस्ती वासियों को गौरवान्वित कर रहे हैं। वह ऐसे जीवट के व्यक्तित्व हैं जिन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य को आत्मसात किया है। प्रारम्भिक शिक्षा बस्ती जनपद के सिविल लाइन स्थित कान्वेंट स्कूल में हुई। उनपर हिंदी भाषा और साहित्य का प्रभाव स्वयं उनके पिता स्व मधुर नारायण मिश्र जी का पड़ा। कहने को तो यह कहा जाता है जिसको जो बनना है ईश्वर उसे उसी और ले जाते हैं।
शांत, मृदुभाषी, संस्कारशील व्यक्तित्व से परिपूर्ण डॉ. मिश्र प्रारंभ में इतिहास विषय के प्रति उन्मुख हुए किंतु पिता का प्रभाव उन्हें हिंदी भाषा और साहित्य की ओर ले गया। शिवहर्ष किसान पी. जी. कॉलेज, बस्ती से स्नातक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर वह भविष्य के निर्माण हेतु आगे बढ़े, किंतु पिता के आकस्मिक निधन से थोड़ा संघर्ष प्रारंभ हुआ। किंतु बड़े भाई श्री कृष्ण कुमार मिश्र जी का आशीष पाकर वह हिंदी भाषा और साहित्य के पथ पर अग्रसर हुए। एम.ए. हिंदी साहित्य से उत्तीर्ण होने साथ गोरखपुर विश्वविद्यालय का हिंदी विषय का स्वर्ण पदक तत्कालीन राज्यपाल श्री विष्णुकांत शास्त्री जी से प्राप्त कर डॉ मिश्र ने शहर को गौरवान्वित किया। हिंदी की उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में एम.फिल. में प्रवेश लेकर स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता और दूसरा सप्तक विषय पर दलित साहित्य के मर्मज्ञ प्रोफेसर कालीचरण स्नेही के सानिध्य में किया। तत्पश्चात उतर और दक्षिण भारत के महाविद्यालयों में हिंदी अध्यापन कार्य करने के साथ दक्षिण भारत के राज्यों में हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार हेतु विभिन्न कार्यशालाओं का आयोजन कर हिंदी भाषा को प्रचारित करने में विशेष भूमिका निभाई। उनके हिंदी प्रेम और प्रचार कार्यों को देखते हुए दक्षिण भारत की तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी चेन्नई ने 2017 में उन्हें हिंदी सेवी सम्मान से अलंकृत कर उतर प्रदेश के साथ बस्ती शहर को गौरवान्वित किया। उनका प्रबल इच्छा है कि हिंदी राष्ट्रभाषा के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बने किंतु सभी भारतीय भाषाओं के समागम से हिंदी राष्ट्रभाषा बने। उनके इन्हीं कार्यों को देखते हुए भारत सरकार मॉरिशस में आयोजित 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में उन्हें सरकार के प्रतिनिधि मंडल के सदस्य के रूप में प्रतिभाग करने का अवसर प्रदान किया। वह हिंदी भाषा के प्रचार–प्रसार तथा सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहने वाले व्यक्ति हैं। हाल ही में केंद्रीय हिंदी निदेशालय, भारत सरकार, नई दिल्ली ने अपने व्याख्यान माला कार्यक्रम में डॉ मिश्र को दक्षिण भारत के विश्वविद्यालयों में हिंदी व्याख्यान हेतु भेजा, जिसमें उन्होंने कोचीन, कालीकट और केरल विश्वविद्यालय, त्रिवेंद्रम के हिंदी विभाग में हिंदी भाषा और साहित्य से संबंधित व्याख्यान देकर हिंदी की व्यापकता में अपना अमूल्य योगदान दिया। वह हिंदी भाषा और साहित्य के अनुवाद पर ज्यादा बल देने के समर्थक हैं। वह हर भाषा को हिंदी से जोड़ने पर बल देने वाले व्यक्ति हैं। वैश्विक पटल पर हिंदी जैसे विषयों को लेकर उनका अभियान हमेशा चलता रहा। हाल में रुस-अर्मेनियाई विश्वविद्यालय, येरेवन, अर्मेनिया के ओरियंट स्टडीज विभाग ने 18 दिवसीय लेक्चर सीरीज हेतु उन्हें आमंत्रित किया जो उनके हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा का प्रमाण है। अल्माटी, कजाकिस्तान के अल फराबी विश्वविद्यालय ने अपने हिंदी विभाग के 25वें स्थापना दिवस पर आयोजित ‘यूरेशिया में हिंदी की दशा और दिशा’ विषयक संगोष्ठी में आमंत्रित कर यह प्रमाणित किया कि वह हिंदी के प्रचार–प्रसार के सशक्त हस्ताक्षर हैं। इतना ही नहीं हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु डॉ मिश्र श्रीलंका, फीजी, मॉरिशस, कोरिया, कजाकिस्तान, अर्मेनिया की यात्रा कर चुके हैं। श्रीलंका में हिंदी के प्रचारक प्रोफेसर लक्ष्मण सेनेविरत्न पर उनके द्वारा संपादित पुस्तक यह प्रमाणित करती है कि उन्होंने विदेशी हिंदी सेवियों को कितने निकट से देखा है। उनके बहुत से आलेख विदेशी हिंदी विद्वानों पर विभिन्न समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं जिनमें प्रोफेसर जावेद खोलोव, डॉ मैक्सिम डैकोमिच, डॉ सुभाषिनी लता कुमार, प्रोफेसर लक्ष्मण सेनेविरत्न, प्रोफेसर लुदमिला खोलोव, प्रोफेसर इंद्रा दशनायक पर लिखे आलेख सचमुच विदेशी हिंदी विद्वानों को जानने का प्रमुख आधार हैं। उनके द्वारा संपादित दो पुस्तकें ‘फिजी हिंदी काव्य साहित्य’ एवं ‘मन की अनुभूति’ बेहद महत्वपूर्ण हैं जिनमें उन्होंने उन विदेशी हिंदी सेवियों की कविताओं को संकलित किया जो मूल रूप से विदेशी हैं और हिंदी में काव्य लिख रहे हैं। वह हिंदी सेवा और प्रचार हेतु विदेशी विश्वविद्यालयों से सम्मानित होते रहे हैं वर्तमान समय में वह सबरागामुवा विश्वविद्यालय, श्रीलंका में भाषा विभाग के आमंत्रण पर 5 मार्च से 3 अप्रैल 2026 तक श्रीलंका मूल के सिंहली छात्र–छात्राओं को हिंदी भाषा और साहित्य का ज्ञान करा रहे हैं। डॉ. मिश्र का जीवन हिंदी भाषा और साहित्य को विश्व में प्रचारित और प्रसारित करने का रहा है। हाल में कोलंबो, श्रीलंका में भारतीय सांस्कृतिक केंद्र ने प्रथम भारत–श्रीलंका हिंदी सम्मेलन में आमंत्रित कर उनका जो सम्मान किया उससे प्रमाणित है कि वह हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार–प्रसार के विश्व यात्री बनकर विदेशी भूमि पर हिंदी भाषा और साहित्य को पुख्ता कर रहे हैं। उनका मानना है कि हर कार्य में पहले अकेले ही चलना होता है, कारवां तो बाद में बनता है। इसलिए वह हर प्रयोग स्वयं पर करते हैं, बाद में उसमे लोगों को जोड़कर नया अध्याय लिखते हैं। उनका हर पड़ाव हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु बना है। हम सभी बस्ती जनों को गर्व है कि वह बस्ती के ऐसे लाल हैं जिन्होंने विदेशों में हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार प्रसार में अपनी भूमिका को प्रमाणित किया है।
डॉ. मारुति शुक्ल